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Saturday, February 5, 2011

हंसुली जैसा चाँद


हंसुली जैसा चाँद निकलकर जब छत पर आया
सुधियों का चंदनवन मेरे अंतस उग आया
पारद बनकर ये पाजी मन कण कण बिखर गया
धुंधला सा इक चित्र किसी प्रतिमा का निखर गया
इक पल ऐसा लगा कि जैसे नूपुर कहीं बजे
दूजे पल यों लगा कि मेरा मन था भरमाया

बीती सारी उमर ढूँढ़ते ताल कहीं जल के
काश कोई लौटा कर लाता बीते पल कल के
नरम हथेली धर मांथे पर कोई जगा गया
पता चला अवचेतन द्वारा चेतन छला गया
आज सवेरे आकर जब कुछ बोल गया कागा
हर आहट पर लगा कि जैसे मनभावन आया

थके थके से अश्व सूर्य के धीरे आज चले
स्वर्णमयी संध्या आ पहुंची घर घर दीप जले
रहा सोचता बैठा बैठा उठ कर कहीं चलूँ
या रत रहूँ प्रतीक्षा में बन दीपक स्वयं जलूं
घिर घिर आई रात अँधेरी चाँद नहीं आया
है यह मेरी नियति कि मैंने सदां शून्य पाया
बी एल गौड़
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