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Wednesday, February 9, 2011

आईये मानव बने

कहीं अपना शोषण आप खुद ही तो नहीं कर रहे !

याद रहे, अगर आपके ह्रदय में जरा सा भी भय है तो आपका शोषण पक्का होगा.

एक बार मेरी मुलाकात एक महात्मा से हुई जो देखने में दिव्य प्रतीत होते थे – चेहरे पर तेज, श्वेत दाढ़ी, लंबे श्वेत केश, श्वेत परिधान. देखने मात्र से ही विदित हो रहा था कि कोई आलौकिक ज्योति है महानुभाव की अंतरात्मा. उनसे मेरा मिलन एक ईश्वरीय संयोग ही था.

उन दिनों मैं शोषण को खत्म करने के लिए उपाय ढूंढ रहा था. मेरे चिंतन का एक मात्र उद्देश्य शोषण को खत्म करना ही था. तमाम प्रश्न मेरे मन-मस्तिष्क को एक साथ झकझोर देते थे. फिर भी मैं प्रयासरत था.

महात्मा जी के दर्शन पाकर मुझे अत्यधिक प्रसन्नता इसलिए भी हुई कि क्या पता महात्मा जी कुछ मदद कर दें और मैं अपने लक्ष्य तक पहुँच जाऊं. मैं कुछ देर तक उनके पीछे पीछे चलता रहा. कुछ दूरी तय करने के पश्चात एक बगीचे में बैठकर महात्मा जी विश्राम करने लगे तो मैं भी थोड़ी दूरी पर जाकर बैठ गया.

कुछ देर तक अकेला बैठने के बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा – बालक, इतनी देर से मेरा पीछा क्यों कर रहे हो ? क्या बात है ? मैं बहुत खुश हुआ कि शुरुआत उन्हीं की ओर से हो गई. मैने प्रश्न किया — महात्मा जी, जीवन की सच्चाई क्या है ? चूँकि मेरा मानना था कि मृत्यु एक ऐसा बिंदु है जहां जीवन समाप्त हो जाता है. तो फिर मृत्यु जीवन की सच्चाई कैसे हो सकती है ? ज्ञातव्य है कि जीवन तो मृत्यु पूर्व व्यतीत हुए समय को कहा जाता है.

मेरा प्रश्न सुनकर वह हंसने लगे, फिर मेरी पीठ थपथपाकर बोले – इतनी छोटी उम्र और इतना सुन्दर प्रश्न ! फिर वह धाराप्रवाह बोलने लगे. देखो बेटा, प्रत्येक कदम पर नवीनता से भरे इस जीवन की तीन सच्चाईयां हैं. पहली भूख, दूसरा शोषण और तीसरी सच्चाई मृत्यु है.

मैने महात्मा जी से दूसरा प्रश्न किया – गुरुदेव, शोषण कब खत्म होगा ? वह पुनः धाराप्रवाह हो गए. उन्होंने कहा – बेटा, समाज और सत्ता की धारा में बहने वाले लोग जीवन की तीसरी सच्चाई अर्थात अर्थत मृत्यु से इतना डरते हैं कि वे सत्य से सदैव कोसों दूर भागते रहते हैं इसे अनुसरण करने के बजाय. नहीं तो मृत्यु को छोड़ जीवन की सभी सच्चाईयों पर विजय पाना संभव था. परन्तु लोग भय वश स्वयं ही अपना शोषण करा लेते हैं.

कहने का तात्पर्य है कि यदि किसी भी व्यक्ति के ह्रदय में जरा सा भी भय व्याप्त है तो उसका शोषण सुनिश्चित है. फिर मेरी दृष्टि भारत की भयभीत जनता पर टिक गई. शहर हो या गांव, घर हो या कार्यालय, मंदिर हो अथवा मस्जिद, थाना हो या न्यायालय ! हर जगह शोषण राजसिंहासन पर बैठा हुआ है. हर जगह उसकी दासता स्वीकार करने के अलावा मानव के पास कोई विकल्प नहीं है और जो हार मान ले उसे मानव कहना कहां तक उचित होगा !

बहरहाल हम यदि इतिहास की कोख का अल्ट्रासाऊंड करें तो भी यही विदित होगा कि शोषण की गति मानव की गति से अत्यधिक तीव्र है और जहां भी मानव पहुंचेंगे वहां मानव जी से पहले माननीय परम श्रद्धेय शोषण जी महाराज का अधिपत्य होगा.

अब प्रश्न यह है कि शोषण करता कौन है ? और क्यों करता है ? इस महान प्रश्न के उत्तर को ठीक प्रकार से समझने के लिए यह जरूरी है कि भारतीय समय के अनुसार भारतीय इतिहास की आत्मा की गहराई में कुछ सदी पूर्व एक जोरदार छलांग लगाईं जाए. हम पायेंगे कि सत्तावादी सोच रखने वाले कवियों ने लिखा है कि समरथ को नहीं दोस गोसाईं. अर्थात सत्ताधारी या बाहुबली यदि मानवता का मर्दन करें तो भी कोई गलत बात नहीं है.

गौरतलब है कि तत्कालीन दौर में शोषण सत्ताधारियों से गठबंधन कर अपनी कार्यकुशलता का परिचय देता था. वक्त बदला. भूगोल का वैश्वीकरण हो गया. ईमानदारी, नैतिकता, त्याग, समर्पण जैसे शब्द प्रचलन से बाहर कर दिए गए. इन शब्दों की गुणवत्ता के बगैर मानव चरित्र की नई परिभाषा का सृजन किया गया. ऐसे दौर में शोषण ने भी दिमाग का भरपूर इस्तमाल किया. वैश्वीकरण की परिकल्पना ने जिस प्रकार विश्व के सभी व्यापारियों को माल बेचने की खुली छूट दे दी, उसी प्रकार शोषण ने भी लोकतंत्र में मूल अधिकारों की तरह प्रत्येक व्यक्ति को शोषण करने का अधिकार दे दिया.

शोषण यह जानता था कि बदलते हुए जमाने में थोड़ी प्रयोगधर्मिता अपनानी ही होगी. वह तुलसीदास की पंक्तियों का अनुसरण करने के साथ साथ सक्षम और अक्षम दोनों प्रकार के लोगों की अंतरात्मा में समाहित हो गया. आज सभी बुद्धिजीवी हैं. इसलिए प्रत्येक मनुष्य का बहुत ही सकारात्मक तरीके से शोषण किया जाता है.

इस समय जब देश के नेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों समेत देश की एक अरब से ज्यादा आबादी बौद्धिकता की पराकाष्ठा को पार कर चुके हैं तो आश्चर्यजनक बात यह है कि आख़िरकार शोषण ने किस प्रकार अपनी सफलता के ग्राफ को गिरने के बजाय इतनी तीव्र गति से उठाया होगा. क्योंकि आजकल बाजारवादी परंपरा में कब कौन किस समय शिखर से जमीन पर आ जाए और उसका कम्पटीटर उसकी जगह ले ले यह कोई नहीं जानता !

ऐसे आलम में भी शोषण ने अपने प्रतिद्वंदियों को आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा क्योंकि शोषण इस बात को भली भांति जानता था कि जब तक समाज में मानवीय मूल्य बचे रहेंगे तब तक उसकी सत्ता को खतरा रहेगा. इसलिये उसने अर्थ का सहारा लिया और यह प्रयोग भी आदरणीय शोषण जी महाराज का सफल रहा. फलस्वरूप भारत जैसे देश की जनता को उसने अपने मूल विचारों से ही दिग्भ्रमित कर दिया. इस प्रायोजनार्थ उसने पश्चिमी देशों की सभ्यताओं का सहारा लिया क्योंकि शोषण के पहले के सभी प्रयोगों का परिणाम पश्चिमी देशों के लोगों को संवेदनहीन बनाना था जिसमें शोषण ने सफलता पाई. इसलिये शोषण जानता था कि बस किसी भी तरह बस एक बार समस्त भारतवासियों को नकली चमक में फंसा लिया तो फिर इनको काबू में लाना कोई बड़ी बात न होगी.

वही हुआ … पूंजीवादी युग में रिश्तों से ज्यादा धन की अहमियत होने लगी. विद्वानों की विद्या से ज्यादा धनी मूर्खों का सम्मान किया जाने लगा. होड़ मच गयी. सभी ने एक साथ सरस्वती को छोड़ लक्ष्मी को अराध्य बनाया. पार्वती, सीता, गार्गी और मीरा रुपी बहनें उग्र नारीवाद के चक्कर में शराब और सिगरेट पीने लगीं. पूंजीपति राम और कृष्ण बन गए. हर तरफ शोषण का घूँघरू बजने लगा. मालिकों ने मजदूरों और मजदूरों ने मालिकों का, पत्नियों ने पतियों और पतियों ने पत्नियों का, प्रेमियों ने प्रेमिकाओं और प्रेमिकाओं ने प्रेमियों का, मां-बाप ने बच्चों और बच्चों ने मां-बाप का, जनता ने नेता और नेता ने जनता का, शिक्षकों ने विद्यार्थियों और विद्यार्थियों ने शिक्षकों का शोषण करना आरम्भ कर दिया. हर तरफ हाहाकार … विद्वान चिल्लाते रहे और उल्लू मुस्कुराते रहे. कुछ दिन बाद किसी संत ने लिखकर प्रमाणित भी कर दिया कि बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी हैं, हर साख पर उल्लू बैठा है अंजाम गुलिस्तां क्या होगा !

सच्चाई, ईमानदारी, नैतिकता, त्याग और समर्पण जैसे शब्दों को किताबों के पन्नों में दफ़न कर दिया गया. रोटी के लिए किसी भी कीमत पर बिकने लगे लोग. विदर्भ के किसान भूख से मर गए और राहुल महाजन के सचिव कोकीन खा कर. लेकिन शोषण न मरा; यद्यपि अमर हो गया. सभी ने यह मान लिया कि जीवन जीना है तो मूल्यों को छोड़ सिर्फ धन प्राप्ति का रास्ता अख्तियार करना होगा, क्योंकि यदि भूख बड़ी सच्चाई है तो शोषण भी उसका बड़ा भाई है.

यत्र पूज्यन्ते नारी रमन्ते तत्र देवता की शैली पर चलने वाले देश के लालों ने देवियों के वक्षों को नंगा कर, विश्व की मंडियों में अपनी दूकानें स्थापित कीं. अब यहां कोई सावित्री, सीता, दुर्गावती, लक्ष्मीबाई और मीरा नहीं बनना चाहतीं. देखने को मिलता है कि देवियाँ धन अर्जित करने हेतु किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार हो चली हैं. क्योंकि हमारा समाज अब देवियों को सजा देता है और विषकन्याओं को झूठे सम्मान की लत लगाकर उन्हें दिग्भ्रमित कर उनकी मनुष्यता को ही मिटा देता है. अब सत्य झूठ दिखता है और झूठ सच. इक्कीसवीं सदी में हैं हम लोग और सूरज से भी ज्यादा ताप हो गया है शोषण का. लेकिन अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.

भूख की आंधी में भारत का सम्मानजनक अतीत धूल की तरह न जाने कहां उड़ गया. रोटी के लिए अब सरेआम अस्मतें नीलाम हो जाती हैं और ये कार्य अब अंग्रेज नहीं अपने ही भाई-बंधु करते हैं. लोग बाग जाति, धर्म, भाषा, प्रांत व अमीरी-गरीबी के द्वेष में मशगूल हैं. मनुष्यता कब खत्म हो गई पता ही नहीं चला. शोषण खुश है अपनी विजय पताका के साथ, क्योंकि इस अंधेर नगरी का राजा वही है.

आज शोषण भारतीय समाज में प्रतिष्ठापित हो गया है. महात्मा जी ने कहा – बेटा, शोषण को खत्म करना चाहते हो तो समस्त मानवजाति को संवेदनशील बनाने के लिए कुछ उपाय करो. मेरी आँखें भर आईं. क्योंकि मैं भूल गया था कि यह देश सिर्फ कबीर, बुद्ध, शंकराचार्य, महावीर, दयानन्द सरस्वती, विवेकानंद, भगत सिंह, महात्मा गांधी, लोहिया, जय प्रकाश, कांशी राम, सुभाष चन्द्र बोस और दीनदयाल उपाध्याय का ही नहीं जयचंद और मीर जाफर का भी है, और उनकी सशक्त विचारधारा का नाश अब समाज ही कर सकता है. मैं तो इस समाज की इकाई भर हूँ.

Abhishek Maanav for Bharat Bolega, New Delhi.ऐसे दौर में मानव यही कहता है: मदिरा पीकर बेच दिया, निज मां का अभिमान / रोज देश में हो रहा, मानव का अपमान.

- अभिषेक मानव | 9818965667

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