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Thursday, March 3, 2011

शिवरात्रि क्यों मनाते हैं

"शिवलिंग पूजन का प्रारंभ एवं महत्त्व
दक्ष-प्रजापति ने अपने यग्य में 'शिव" का भाग नहीं रखा ,जिससे कुपित होकर -माँ
पार्वती ने दक्ष के यग्य मंडप में योगाग्नि द्वारा अपना शारीर को भस्म कर
दिया |यह वदित होने के वाद -भगवान् "शिव"अयंत क्रुद्ध हो गए एवं नग्न होकर
पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे | एक दिन वह [शिव ] नग्नावस्था में ही ब्राह्मणों
की नगरी में पहुँच गए | शिवजी के नग्न स्वरूप को देखकर भूदेव की
स्रियां[भार्या ] उन पर मोहित हो गईं|स्त्रिओं की मोहित अवस्था को देखकर
ब्राह्मणों ने शिवजी को शाप दे दिया कि-ये लिंग विहीन तत्काल हो जाएँ एवं
शिवजी शाप से युक्त भी हो गए ,जिस कारन से तीनों लोकों में घोर उत्पात होने
लगा |

समस्त
देव ,ऋषि ,मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गए | ब्रह्मा ने योगबल
से शिवलिंग के अलग होने का कारन जान लिया और समस्त देवताओं ,ऋषियों ,एवं
मुनियों को साथ लेकर शिवजी के पास गए -ब्रह्मा ने शिवजी से प्रार्थना की कि
-आप अपने लिंग को पुनः धारण करें -अन्यथा तीनों लोक नष्ट हो जायेंगें |
स्तुति को सुनकर -भगवान् शिव बोले -आज से सभी लोग मेरे लिंग की पूजा
प्रारंभ कर दें ,तो मैं अपने लिंग को धारण कर लूँगा | शिवजी की बात सुनकर
सर्वप्रथम ब्रह्मा ने सुवर्ण का शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया | पश्चात
देवताओं ,ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्वयों के शिवलिंग बनाकर पूजन किया |
तभी से शिवलिंग के पूजन का प्रारंभ हुआ ||

जो
लोग किसी तीर्थ में -मृतिका - के शिवलिंग बनाकर -उनका हजार बार अथवा लाख
या करोड़ बार सविधि पूजन करते हैं-वे शिव स्वरूप हो जाते हैं || जो
मनुष्य तीर्थ में मिटटी ,भस्म ,गोबर अथवा बालू का शिवलिंग बनाकर एक बार भी
उसका सविधि पूजन करता है -वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है

-शिवलिंग
का विधि पूर्वक पूजन करने से -मनुष्य -संतान ,धन ,धन्य ,विद्या ,ज्ञान
,सद्बुधी ,दीर्घायु ,और मोक्ष की प्राप्ति करता है ||

जिस
स्थान पर शिवलिंग का पूजन होता है ,वह तीर्थ नहीं होते हुआ भी तीर्थ बन
जाता है | जिस स्थान पर शिवलिंग का पूजन होता है ,उस स्थान पर जिस मनुष्य
की मृत्यु होती है-वह शिवलोक को प्रप्त करता है | जो शिव -शिव ,शिव नाम का
उच्चारण करता है -वह परम पवित्र एवं परम श्रेष्ठ हो जाता है ||

भाव
-जो मनुष्य शिव -शिव का स्मरण करते हुए प्राण त्याग देता है -वह अपने
करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है ||

शिव
=का - अर्थ है -कल्याण || "शिव "यह दो अक्षरों वाला नाम परब्रह्मस्वरूप
एवं तारक है इससे भिन्न और कोई दूसरा तारक नहीं है --"तारकं ब्रह्म परमं
शिव इत्य्क्षर द्वयं |

नैतस्मादपरम किंचित तारकं ब्रह्म सर्वथा ||

- "झा शास्त्री " मेरठ [उ0प 0]

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