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Friday, March 25, 2011

हंसजी आप परम हंस हैं,मेरे प्रणाम..

आज फिर मन हुआ कि श्री भगवान सिंह हंसजी के लिए कुछ लिखूं।
हंसजी पर लिखने पर एक दृष्टांत याद आया कि जब रामकृष्ण परम हंस की पत्नी शारदा ने विवेकानंद से सब्जी काटने को चाकू मांगा तो विवेकानंदजी ने गुरुमाई को चाकू दिया। गुरुमाई ने आशीर्वाद दिया कि तुम विश्व-मान्य संत बनोगे। विवेकानंद ने पूछा कि -गुरुमाई,मेरे चाकू मांगने और आपके आशीर्वाद देने में क्या अंतर्संबंध है तो गुरुमाई ने कहा- अक्सर लोगों से चाकू मांगने पर वे चाकू की फाल मांगनेवाले की तरफ रखते हैं और चाकू की मूंठ अपनी हथेली में। तुमने चाकू की फाल अपनी हथेली में रखी और मूंठ मेरी तरफ रखी। ताकि सामनेवालो को कोई कष्ट न हो। यही साधु का हृदय है। जो खुद कष्ट सहकर भी दूसरों को सुख देता है।
हमारे श्री भगवानसिंह हंस भी ऐसे ही एक करुणामय हृदय हैं। जो दूसरों के लिए कष्ट सहते हैं। मेरा प्रकाशक बहुत ही गैरजिम्मेदाराना व्यकिति निकला। मुझे पुस्तकें देनें का जो वादा किया वह निर्धारित तारीख पर नहीं दिया। मैंने हंसजी से चर्चा कर दी। मेरे जरा से कहने पर ही हंसजी असलियत जानने के लिए मेरे प्रकाशक के घर पहले गए और अपने घर बाद में। यही साधु का हृदय है। मैं ऐसे करुणामय व्यक्तित्व को प्रणाम करता हूं। और ईश्वर से कामना करता हूं कि हंसजी जैसे और लोग पृथ्वी पर सप्लाई करें।
पंडित सुरेश नीरव
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