Search This Blog

Thursday, March 3, 2011

नित्यानंद तुषार की ग़ज़ल

उसके होंठों पर रही जो, वो हँसी अच्छी लगी
उससे जब नज़रें मिलीं थीं वो घड़ी अच्छी लगी

उसने जब हँसते हुए मुझसे कहा` तुम हो मेरे `
दिन गुलाबी हो गए ,ये ज़िन्दगी अच्छी लगी

पूछते हैं लोग मुझसे , उसमें ऐसा क्या है ख़ास
सच बताऊँ मुझको उसकी सादगी अच्छी लगी

कंपकंपाती उँगलियों से ख़त लिखा उसने `तुषार`
जैसी भी थी वो लिखावट वो बड़ी अच्छी लगी 

- - नित्यानंद `तुषार`
Post a Comment