Search This Blog

Tuesday, March 8, 2011

शत शत नमन



आदरणीय पंडितजी पालागन। मैं आपका बहुत ऋणी हूँ जो आपने मुझे अपनी चरणरज दी । मैं इसी मंगलरुपी भभूत को अपने माथे पर मलता रहता हूँ। आपका आभार व्यक्त करते हुए -
भगवान सिंह हंस
Post a Comment