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Thursday, March 10, 2011

गुलदस्ता-
यहाँ की हवाएं भी कितनी आवारा है .
मारे गए किनारे गुनाह -गार जलधारा है ..
फ़क्र से देते हैं मिसाल जिसके नाम की .
वही समंदर सबसे खारा है ..
ग़र रखते हो ज़ुबां तो बात वाले बनो .
हमारे कद का पैमाना गिरेबाँ हमारा है..
रंजीत गोहे "अकेला"
दिल का गुलशन शाद रखो
पर पतझड़ भी याद रखो
उजयारों को खोजो मत
सूरज की बुनियाद रखो।
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तीरगी पर आज क्यों काबू नहीं रहा....
क्या शहर में एक भी जुगनू नहीं रहा
ठीक हे तेरे गिला की मै बदल गया
यार मेरे तू भी मगर तू नहीं रहा.......

पंकज अंगार
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