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Saturday, March 5, 2011

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य

कुछ अंश आपके तक----
ठीक, तुम्हें दीदी ने भाषा। तुम्हारी नहीं थी अभिलाषा। ।
नहिं तो तुम पहले ही आती। सच सच मुझे क्यों नहिं बताती। ।
ठीक, तुम्हें दीदी ने कहा है नहीं तो तुम्हारी इच्छा नहीं थी। नहीं तो तुम पहले ही आती। यह बात मुझको सच-सच क्यों नहीं बताती है।
नहीं मात! बात नहीं ऐसी। आ रही थी, ना सोच वैसी। ।
तिहरा दुःख उन्हें बहु भारी। स्वसुख हेतु भेजी मैं न्यारी। ।
नहीं, माता! बात ऐसी नहीं है। मैं आ रही थी। मेरी सोच वैसी नहीं है। आपका दुःख उन्हें बहुत है। आपको सुख देने हेतु ही मैं उन्होंनें भेजी हूँ।
रचयिता--भगवान सिंह हंस
प्रस्तुति -- योगेश विकल






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