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Saturday, March 19, 2011

होली की कविताएं

आओ चलें
जड़ों की ओर
खोजें ,खो चुके मूल्यों को
जांचें फिर सिद्धांतों को
टटोलें फिर भौतिकता
विलासिता मै खोये
प्रेम ,सौहार्द ,समर्पण को
जगा अंतरात्मा को
फिर करें विवेचना
की खोया है क्या
और पाया है कितना
ढूंढे फिर से अपनी
पहचान खोती सभ्यता
का खोया सा छोर
की अभी भी ढली नहीं है भोर।
पूनम दहिया
भारत को रंगीन बनाऊंगा

मै रंगों का एक प्यार भरा बादल
बन सपनों का झंकार भरा पायल
आया हूँ बरसने सजाऊंगा हर सपने
पराये हो या अपने हर रंग लगाऊंगा
खुद रंग बन जाऊंगा सबको रंगीन बनाऊंगा
जो बचना चाहोगे रंगों से कहाँ जाओगे
डूब जाओगे इन रंगों में
रंगों की घटा बन बरस जाऊंगा
सबके दिलो में उतर जाऊंगा
मै रंगों का एक प्यार भरा बादल !

लाल रंग से सुहागन बनाऊंगा
पीले रंग से दोस्त बनाऊंगा
हरे रंग से जीना सिखाऊंगा
धानी रंग से चुंदरी रंग जाऊंगा
काले रंग से नजर बचाऊंगा
सिन्दूरी रंग से दुल्हन बनाऊंगा
गेरुए रंग से शांति लाऊंगा
और खुद सफ़ेद रंग में डूब
रंगहीन हो जाऊंगा संगीन हो जाऊंगा
जो रंगहीन है दीन है हीन है
साधन विहीन है फिर भी रंगीन है
उनमे प्यार का रंग सजाऊंगा
उन्हें रंगीन बनाऊंगा
योगी बन कुछ यूंही
अबकी होली मनाऊंगा
मै रंगों का एक प्यार भरा बादल
भारत को रंगीन बनाऊंगा !
यह कविता क्यों ? देशप्रेम का रंग सभी रंगों में श्रेष्ठ होता है इसलिए अपने लिए नहीं देश के लिए होली खेले जिसमे कोई बंधन या पहचान का रंग नहीं होता बल्कि सब रंग एक संग होता है ! होली खेले उनके साथ जिनके संत कोई नहीं खेलता जी।
अरविंद योगी
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