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Wednesday, April 27, 2011

पहले राजा ,अब कलमाड़ी........
पहले राजा, अब कलमाड़ी
घोटालों के चतुर खिलाड़ी
धरी रह गयी सब चतुराई
जब पब्लिक ने वाट लगाई
साथ मीडिया भी चढ़ बोला
सत्ता का सिंहासन डौला
जब घिरने की आई बारी
गिरगिट हो गए सत्ताधारी
चुप्पी साधी मौक़ा ताड़ा
संबंधों से पल्ला झाड़ा
पलट पीठ पर लात लगाई
हवालात की राह दिखाई
मात खा गए कुटिल खेल में
सोचो दोनों बैठ जेल में 
-घनश्याम वशिष्ठ
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नदी जब भी मचलती है, नया एक मोड़ लेती है,

अजब इसकी कहानी है, नया आगाज करती है!

कहीं आंसू, कहीं खुशियाँ, कहीं आफत, कहीं राहत,

किसी को दर्द देती है, कहीं खुशियाँ बरसती है!

अजब इन्सान की ताकत, नदी वो मोड़ देता है,

नदी जब मोड़ लेती है, तो किस्मत भी बदलती है,

कभी वो भूल जाता है, है कुछ, जो है नहीं बस में,

तो आकर वो सुनामी सी, घरोंदे तोड़ देती है!!

बहुत बांधा, बहुत मोड़ा, बहुत रस्ते बनाये हैं,

कहीं नहरों, कहीं झीलों से फसलें लहलहाएँ हैं,

मगर जब वो नदी इन्सान से रुख मोड़ लेती है,

ले वो आगोश में सब कुछ, रेत बस छोड़ देती है!!!
गौरव सिंह
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अपने ख्वाबों को कहाँ तामीर करना है मुझे
तेरे सपनों का जहां तामीर करना है मुझे
हर बुलंदी छीन लेती है जमीं को इसलिए
अब जमीं पर आसमां तामीर करना है मुझे
दिल को उससे जो मिले थे जख्म सारे भर गए
फिर नया एक मेहरबां तामीर करना है मुझे
चार दिन की हो भले पर फूल सी हो जिन्दगी
खुशबुओं सी दास्तां तामीर करना है मुझे
बुलबुलें चहकें ख़ुशी से गुल खिले महके सबा
अब चमन में वो फिजां तामीर करना है मुझे
इस चमन के फूल सारे साजिशों में हैं शरीक
अब नया इक गुलसितां तामीर करना है मुझे।
पंकज अंगार
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