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Sunday, April 3, 2011

तुम्हें कैसे भुला दें हम

तुम्हीं से दिन निकलता है ,तुम्हीं से रात ढलती है
तुम्हें पाने की इस दिल में निरंतर आग जलती है
तुम्हें कैसे न सोचें हम , तुम्हें कैसे भुला दें हम
तुम्हारा दिल धड़कता है तो अपनी साँस चलती है -
-नित्यानंद `तुषार`
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