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Monday, April 11, 2011

बेहतरीन गजल

आदरणीय मकबूलजी पालागन. आज काफी अरसे के बाद आपको ब्लॉग पर देखा, बड़ा इजहार मिला. श्री नीरवजी से आपकी राजी-ख़ुशी पूछता  रहता हूँ. बहुत अच्छा लगता है जब हम सब व्यक्तिगतरूप से एक दूसरे मिलते हैं. दिल में आनंद की एक सिरहन-सी पैदा होती है जो हमारी मुलाकात के अक्षुन्न क्षणों को साकार करती है. आपकी गजल की सहज अभिव्यक्ति सबके मन को मोह लेती है. गजल  कहने का आपका एक अलग ही अंदाज है. आज जो आपने गजल  कही है बड़ी बेहतरीन और दिल में दर्द की एक टीस पैदा करती है. वास्तविकता एवं सच्चाई है कि आज राह बड़ी कठिन है. उस पर चलना आसान नहीं है. परन्तु श्री मकबूलजी साथ चलने के लिए आग्रह करते हैं जिससे राह पर चलना कुछ आसान हो जाये. उस पर कुछ दूर चला जा सके. शायर निरीहता से दूर रहना चलता है.शायद  यही उनका मकसद है.
 आपकी गजल -

कठिन है राहगुजर थोड़ी दूर साथ चलो.

 बहुत अच्छी लगी. मन प्रसन्न हो गया.और ये पक्तियाँ भी दर्द को नवाजती हैं. देखिये-

तवाफे-मंजिले-जानां हमें भी करना है
फ़राज़ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो. 

इतनी बेहतरीन गजल के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई. मेरा आग्रह है कि आगे भी ऐसी ही गजल कहते रहिए. पालागन.  


राम नवमीं की जयलोकमंगल के सभी सदस्यों एवं देशवासियों को शुभकामनाएं.

भगवान सिंह हंस


भगवान सिंह हंस
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