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Monday, April 11, 2011

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो

मित्रो, आज फिर मौक़ा मिला है, लिहाज़ा हाजिरी दर्ज़ कराते हुए अहमद फ़राज़ की एक ग़ज़ल पेश है। कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो। तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो। नशे में चूर हूँ मैं भी, तुम्हें भी होश नहीं बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो। ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है किसे है कल की खबर, थोड़ी दूर साथ चलो। तवाफ़े-मंज़िले-जानां हमें भी करना है फ़राज़ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो। मृगेन्द्र मक़बूल
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