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Sunday, April 17, 2011




मैं एक लम्बे भ्रमण - जबलपुर्, डिंडोरी, भोपाल, बड़वानी (द्वारा देवास, ) और नौएडा - तथा एक छोटे भ्रमण - जयपुर और वापिस - पर गया था। सभी स्थानों में बाल विकास भारती की‌नई शाखाएं स्थापित करना था। पूरा भ्रमण बहुत ही उपयोगी तथा सफ़ल रहा।

जयपुर में एक् विशाल संस्था है ' आर्क एकैडैमी आफ़ डिज़ाइन', यह 'नेशनल इंस्टिट्यूट आफ़ डिज़ाइन, अहमदाबाद' से मिलती जुलती है, बस अंतर यह कि यह बजाय शासकीय क्षेत्र के निजी‌क्षेत्र में है। इसकी स्थापना एक अद्भुत साहसी महिला अर्चना सोलंकी ने, बहुत ही लघु स्तर से प्रारंभ की थी, जो अब प्रशंसनीय रूप में विशाल हो गई है, एक भारतीय महिला क्या नहीं कर सकती। !

इसमें व्याख्यान का मेरा विषय था 'पेज थ्री वर्सैस चैप्टर थ्री' - हिन्दी में ही था। इसमें मुझे 'फ़ैशन डिज़ाइन के विरोध में कहना पड़ा। उन निदेशिका ने मुझे बीच में ही रोककर विद्यार्थियों से कहा कि जब मैं उनके प्रिय कार्य - फ़ैशन - के विरोध में इतना कुछ कह ऱहा हूं तब वे मुझे टोककर कुछ प्रश्न क्यों‌ नहीं पूछ रहे हैं?

विद्यार्थियों ने प्रश्न पूछे, किन्तु मेरे व्याख्यान की समाप्ति पर। जब वे सब संतुष्ट हो गए तब उन निदेशिका महोदया ने धन्यवाद देते हुए कहा कि मैने उनके भी‌हृदय का परिवर्तन कर दिया है। उऩ्होंने कहा कि जैसा तिवारी जी ने कहा है हमें आवश्यक डिज़ाइन ही करना है अनावश्यक नहीं, मात्र फ़ैशन के लिये नहीं।
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