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Tuesday, May 10, 2011

दिल से जब भी तुझे याद करता हूं मैं


ग़ज़ल-
दिल से जब भी तुझे याद करता हूं मैं
खुशबुओं के नगर से गुजरता हूं मैं

गुनगुनी सांस की रेशमी आंच में
धूप सुबह की होकर उतरता हूं मैं

नर्म एहसास का खुशनुमा अक्स बन
लफ्ज़ के आईने में संवरता हूं मैं

कांच के जिस्म पर बूंद पारे की बन
टूटता हूं बिखर कर संवरता हूं मैं

चंपई होंठ की पंखुरी पर तिरे
ओस की बूंद बनकर उभरता हूं मैं

क़ह़क़हों की उमड़ती हुई भीड़ में
हो के नीरव हमेशा निखरता हूं मैं।
पंडित सुरेश नीरव
आई-204,गोविंद पुरम,गाजियाबाद
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