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Sunday, May 22, 2011

समाज
सम हो तो आजु मिलो बैठो
धन दोलत को गर्व करो नहीं , लक्ष्मी है आनी जानी
उल्लू पर जब जाय विराजे , राजा होएँ रंक मये रानी
जा लक्ष्मी को मोह त्याग कें
सब के बीच मिलो बैठो
सम हो तो - - - - - - - - - - -|
बल बुद्धि पे गर्व करो नहीं , सब माटी को खेला है
ऊपर वाले की मर्जी बिन, किसने इक पल झेला है
जब सभे बराबर जाना है
तो काहे ताल यहाँ ठोको
सम हो तो - - - - - - - - - - -|
पद पाए बोराओ नहीं तुम, पद की है निश्चित सीमा
पद से ही पहिचान रही तो मुश्किल होगा फिर जीना
अपनी ही पहिचान बनाओ
मानव बनकर मिल बैठो
सम हो तो - - - - - - - - - - -|
कोऊ छोटो बड़ो नहीं है, न कोऊ हेगो बहुत गरीब
जो अपने कों छोटो माने, रहे सभी के सदा करीब
तुम भी छोटे बनकें भैया
यहाँ करीब आय बैठो
सम हो तो - - - - - - - - - - -|
सम वही जो दिल से बोले, मोंह से बोले न वाणी
दिल की बात रही यदि दिल में मुंह करता है मनमानी
दिल की बात कों सुनकें प्यारे
सबके दिल में बन बैठो
सम हो तो - - - - - - - - - - -|
सम रहें कर्म, समै इच्छा, समै मन मर्यादा भी
सम रहे दान, समै रहे आदर , और सदा सम आचरण भी
सम को आजू यह मंत्र मन कर
सम प्रेम से मिल बैठो
सम हो तो - - - - - - - - - - -|

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