उसूलों कायदों को तोड़ता है
वजन रखिये तो कागज़ दौड़ता है।
बदल कर क़त्ल को ये ख़ुदकुशी में
अभी लिख कर निशानी छोड़ता है।
हक़ीकत से ये बचता है हमेशा
मगर झूठों से रिश्ता जोड़ता है।
वो पढ़ लिख कर अभी बेकार ही है
बड़ी तेज़ी से पत्थर फोड़ता है।
वो बच्चों के किसी स्कूल में है
वहां फूलों की क्यारी गोड़ता है।
प्रकाश मिश्र
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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