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Thursday, May 12, 2011

ज्ञान गीत


यह सत्य कि मैंने तुमको अगणित गीत सुनाये हैं अब तक
भावुकता की मादकताओं से नयन मिलाये हैं अब तक
मैंने पूजी वह मूर्ति बोल जो सकी न, यद्यपि थी सुन्दर
मैं घूमा अब तक वृत्तों में औ, रहा वहीँ अब तक चल कर
मेरी कविता के विषय रहे थे चाँद, चांदनी औ, राका
उषा भावों की रानी थी, रजनी थी सपनों की मलिका
मैं गीत पुरातन गाता था, चलता आगे, लखता पीछे
कल्पना घनों पर केलि किया करता यूं ही आँखे मीचे
गीतों पर मैं बलिदान अभी तक कर देता था युग तक को
यह युगों युगों तक गूंजेगा जो गीत सुनाऊंगा तुमको
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