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Wednesday, June 1, 2011

जीवन सांसों का यांत्रिक व्यायाम नहीं है।


जीवन मूर्त भी है और अमूर्त भी
 आदरणीय पंडित सुरेश नीरवजी..जीवन क्या है? यह मूर्त है या अमूर्त? समझाकर बतलाइए। आपसे यह जानने  की मेरी  बड़ी जिज्ञासा है।
                              -भगवान सिंह हंस
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हंसजी जीवन को जिया जाता है। जीवन को अनुभव किया जाता है। जीवन को परिभाषित करने का अर्थ है,जीवन को निर्जीव बना देना। जीवन हमारे होने की घोषणा है। यह हमारे भीतर का संगीत है। यह हमारे भीतर का भी भीतर है। यह फ्रॉम विदिन है। सही मायनों में हम जितने क्षण प्रकृति के समीप होते हैं, उतने ही क्षण हम जीवन के करीब होते हैं। जितने क्षण हम आनंद के जीते हैं, प्रेम के जीते हैं, समर्पण के जीते हैं बस उतने ही क्षण हम जीवन जीते हैं। जीवन सांसों का यांत्रिक व्यायाम नहीं है। किसी मांस पिंड का दिन-रात धड़कना भी जीवन नहीं है। जीवन एक ऐसी अविराम और अप्रतिम घटना है जिसे हम जाने बिना भी जिए चले जाते हैं। मगर सही अर्थों में जीवन को जीना एक कला है।  जीवन हमारे अनवरत अनुभवों का नाम है। हमारी जो मान्यताएं हैं वे काल के पैमाने से जीवन को नापती हैं। काल ही जीवन है और काल ही मृत्यु है। जीवन और मृत्यु काल सापेक्ष हैं। समय सापेक्ष हैं। जो बीत गया वह भूत काल है। जिसे हम जी चुके या जितने क्षण जी लिए वे मृत्यु के खाते में चले गए। भविष्य के क्षण अभी आने हैं। ये भी निश्चित नहीं कि वे क्षण हम जी भी पाएंगे कि नहीं।  इस तरह केवल वर्तमान है, जिसे हम जीते हैं। जी सकते हैं। और अपने हिसाब से उन्हें ढाल सकते हैं। इसलिए वर्तमान में जीना ही जीवन है। और वर्तमान ही जीवन है। वर्तमान सदैव है। वर्तमान ऑलवेज है। शाश्वत है और सनातन है। इसलिए जीवन भी सनातन है। जीवन की कभी मृत्यु नहीं होती। जीवन कभी मर भी नहीं सकता क्योंकि मृत्यु का कभी जन्म नहीं होता। जीवन काल से परे भी है। जिसे अमरत्व कहा जाता है। जो काल से परे है वही अमृत्व है। यही पंथ का अकाल है। यही बाइबल का बियांड द टाइम है। यही नारद का मोक्ष है। यही बुद्ध का निर्वाण है। और यही महावीर का कैवल्य भी। जीवन अस्तित्व है। और अस्तित्व का अस्तित्व क्या कभी समाप्त हो सकता है। जीवन सत् है। जीवन चित् है। और जीवन आनंद है। सत-चित- आनंद। सदचिदानंद। मृत्यु जीवन के रास्ते का मोड़ है,मंजिल नहीं। इसलिए जीवन मृत्यु के पहले भी था और मृत्यु के बाद भी रहेगा। मृत्यु तो बस एक द्वार है जीवन का। जहां से जिंदगी फिर एक ऊर्जा से भरकर अमरत्व की और दौड़ने लगती है। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल,अशफाकउल्ला और भगत सिंह का फांसी के फंदे पर हंसते हुए चढना यही तो बताता है। कि मौत के द्वार से गुजरकर जिंदगी अमरत्व को उपलब्ध हो जाती है। कृष्ण भी तो गीता में अर्जुन से यही कहते हैं- कि हे पार्थ, कौन किस को मार सकता है। अगर किसी को मारा जा सकता है तो मारनेवाला भी मारा जाएगा। और जब मरने और मारनेवाला दोनों ही मर सकते हैं तो फिर हम सब मरे ही हुए हैं। और फिर मरे को मारने में काहे का पाप। लेकिन पार्थ क्या कोई कभी मरता है। अरे आत्मा तो केवल वस्त्र की तरह शरीर बदलती है। आत्मा तो अजर-अमर है। जिसे न तो किसी शस्त्र से वेधा जा सकता है और न जिसे जलाया जा सकता है। न इसे गीला किया जा सकता है और न इसे सुखाया जा सकता है। आत्मा अस्तित्व है। शरीर बस माध्यम है। सिर्फ एक उपकरण। सूली पर लटके ईसा सलीब पर कील ठोंकनेवालों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि प्रभु इन्हें नहीं मालुम ये लोग क्या कर रहे हैं। इन्हें क्षमा कर देना। वे सूली पर लटके हुए भी करुणा से भरे हुए हैं। कहीं कोई उत्तेजना नहीं। क्योंकि वे जानते थे कि मारनेवाले भी उन्हें कहां मार सकते हैं। सुकरात को जेल में जहर दिया जाना है। वह जहर पीसनेवालों से कह रहे हैं कि जरा जल्दी पीसना जहर को।  देखो, देर मत करो। मैं तुम लोगों को ज्यादा देर तक परेशान नहीं देखना चाहता। मुझे साक्षी भाव से मृत्यु को देखना है। तो जिंदगी जो मौत को देखती हो,मौत से बतियाती हो, वह ज़िंदगी भला कभी मर भी सकती है। मुरझाते फूल हैं। सुगंध नहीं। सुगंध तो हमेशा रहती है,हवाओं में। सुगंध कब मरती है। फूल बस माध्यम बनता है उस खुशबू को वातावरण से खींचकर हम तक पहुंचाने का। शरीर फूल है। और जीवन उसकी सुगंध। मरने के बाद चिता से जो अस्थियां बीनी जाती है इसीलिए तो उन्हें फूल कहा जाता है। हरिद्वार में,प्रयाग में इन्हीं अस्थियों-फूलों का ही तो विसर्जन होता है। सुगंध तो पहले ही कैलास मानसरोवर तक पहुंच जाती है।  अंत में आपने पूछा है कि जीवन मूर्त है या अमूर्त तो जिस जीवन को हम शरीर के माध्यम से अनुभव करते हैं वह मूर्त है और शरीर के अलावा भी जिस जिंदगी का हम अनुभव करते हैं वह अमूर्त है। इसलिए जीवन मूर्त भी है और अमूर्त भी।
शायद मैं आपकी जिज्ञासा को दुलार पाया होऊं..
मेरे प्रणाम...
पंडित सुरेश नीरव
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मृत्यु के प्रश्न पर कुछ प्रतिक्रयाएं-

मेडिकल लाइन के अनुसार मृत्यु दो प्रकार से होती है। एक मृत्यु मैं ह्रदय और मस्तिष्क दोनों काम करना बंद कर देते हैं यही वास्तविक मृत्यु होती है। दूसरी स्थिति मैं ह्रदय काम करता रहता है मस्तिष्क निष्क्रिय होजाता है। कहते उसे भी मस्तिष्क मृत्यु (ब्रेन के ) ही हैं, किन्तु उसे मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं दे सकते । गरुड़ पुराण मैं तो जीव की पूरी तेरह दिन की यात्रा का वर्णन है। लेकिन ये सारी मान्यताएं जीव के भविष्य को लेकर हैं हम और आप अपने शरीर के कारण हम और आप हैं , वह तो यहीं रह गया। उसकी नियति तो केवल खाक है चाहे शमशान की हो चाहे लोदी विद्युत् गृह की हो चाहे किसी कब्रिस्तान की हो, और उसके लिए आपको हम डाक्टरों से प्रमाणपत्र अवश्य लेना पडेगा।
                                                         -कर्नल विपिन चतुर्वेदी
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भाई भगवान सिंह हंस ने प० सुरेश नीरव से प्रश्न किया है कि मृत्यु क्या है।
इस पर मुझे एक शेर याद आ रहा है कि,
ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में तरतीबे- ज़हूर
और मौत है, इन अरजां का परीशां होना।
मतलब कि दुनिया में चीज़ों का सिलसिलेवार रहना ही ज़िन्दगी है, और
इस सिलसिले का परीशां होना या टूटना ही मौत है।
                                                          -मृगेन्द्र मकबूल
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