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Tuesday, July 12, 2011

कालका मेल मौत का खेल

कालका मेल मौत का खेल

कालकलवित कर दिया
कालका ने काल को
ज़िन्दगी समझ नहीं पाई
मौत के फैले जाल को
प्यार के मखमली रुमाल को
सफ़र में खोये ख्याल को
लहूलुहान कर दिया
सुनसान कर दिया
जिंदगी की रफ़्तार को
यात्रा में हो सवार खामोश मौत
बन तूफान दे गया कालका को चोंट
और जिंदगी की रेल बन गयी
खुनी कालका मेल
अकाल की कालका काल की कालका
कुछ यादों के खुनी धुंएँ छोड़ गयी
पर पटरियों पर अब भी
चल रही जीवन की रेल
हमेशा की तरह छुक छुक कर
कुछ रुक रुक कर जीवन की तरह
ओह कालका मेल मौत का खेल

यह कविता क्यों ? कालका मेल ने रेल को खुनी खेल बना दिया जो कालका का एक कला इतिहास ही नहीं वरन जनमानस का कला दिन रहा ! इस्वर मृतक आत्माओं को शांति प्रदान करें ! अरविन्द योगी
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