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Tuesday, August 2, 2011

१ में नदी हूँ

१ में नदी हूँ
में नदी हूँ
पीर हूँ हिमखंड की

जब सह न पाया ताप वह
दिनमान के उत्कर्ष का
गलने लगा
बहने लगा
धार बनकर नीर की
बहती हुई उस पीर का
परियायवाची नाम मेरा धर दिया
कह दिया
की मैं नदी हूँ
संजीवनी बनखंड की

छोड़ पीहर जब चली थी
चाल थी प्रचंड मेरी
पारदर्शी रूप था
धूप जैसा रंग था
पर धरा के वासिओं ने आन घेरी
गंदगी के ढेर से
हर अंग मेरा धक् दिया
चांदनी सा रूप मेरा
बादलों सा धूसर कर दिया
अब क्या करूं
बेहद दुखी हूँ
मारकर मन बह रही हूँ

क्या कहूँगी मैं समंदर से
जो बड़ा बेताब है मेरे मिलन को
कैसे कहूँगी
प्रिय ! तुम मुझे स्वीकार करलो
मैं कुरूपा हूँ नहीं , कर दी गयी हूँ
नहीं यह दोष मेरा
दोनों तटों को आज मेरे
आदमी का रूप धरकर
वनचरों ने आन घेरा
लाज उनको है नहीं छूकर गई
पूरी तरह विद्रूप करके ,वे मुझे
कह रहे हैं गर्व से
की मैं नदी हूँ
भोगती हूँ नित सजा म्रतुदंड की

बी एल गौड़
बी १५९ , योजना विहार , दिल्ली ९२ .
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