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Tuesday, August 2, 2011

सफलता .....

कादम्बिनी के प्रवेश स्तम्भ में प्रकाशित 
मेरी चार  कविताएँ .....(दो )
सफलता .....

वह उसके लिए 
सुबह से शाम तक 
निरंतर /अयति
पिसता रहा 
जलता रहा 
गलता रहा 
अपने इस श्रम का 
जिसमें वह , 
सागर भर पसीना बहाता रहा 
अंशुमाली की गर्म सुइयों से 
बिंधता रहा 
एक पल रुकने के भय से -
स्थिल पड़ते हाथों में 
बलात- 
खून का संचार करता रहा 
निरंतर सक्रियता के लिए 
फल की चाह 
वंचितता की व्यथा 
दीवार तोड़ता रहा 
परिणति ..
सफलता नून रोटी की 

घनश्याम वशिष्ठ 

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