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Wednesday, August 31, 2011

इक्कीसवीं शती का मेरा मेरा नाती


“2 फरवरी को बसंत पंचमी है, सरस्वती की पूजा है”, मैने अपने नाती से यूं ही बात करने के इरादे से कहा।वह तो एक नामी गरामी कॉन्वैन्ट से 10 ट्ट 2 करने के बाद सैन्ट स्टीफैन्स में इंग्लिश ऑनर्स में पढ़ रहा है, और हॉस्टल से छुट्टियों में मेरे पास आ गया था।
“अरे नाना जी इतने साल आप वायु सेना में नौकरी करने और विदेशों में रहने के बाद भी इन आउट आफ डेट चीजें को मानते हैं।”
मैं थोड़ा झिझका, पर साहस कर कहा, “देखो शीत ऋतु जा रही है, और बसंत की मधुर ह्यमैने डर के मारे मादक नहीं कहाहृ ऋतु आ रही है।प्रकृति अपने पुराने रूप को छोड़कर नये रंगीन परिधान पहन रही है।सभी जगह जैसे नया जीवन आ रहा है।इसका आनन्द तो मनाना ही चाहिये”
“नाना जी आप अपनी पुरानी पढ़ी बातें दुहरा रहे हैं। अरे आप भूल गए अपनी वायु सेना की क्रिसमस और ईस्टर डान्स पार्टीज़। क्या दिल्ली में दिखती है आपको ऐसी बहार कि 2 फरवरी तक रुका जाए ? दिल्ली में असली बहार तो नवंबर से ही शुरु हो जाती है जब से सारे बगीचों में डेलिया, क्रिसैन्थिमम, फ्लॉक्स, ग्लैडियोलाइ, एस्टर, एन्टिराइनम, सन्नेरिया, सैल्विया और हां, रोज़ की फैशन परेड शुरु हो जाती है।और आप शीत ऋतु की तो ऐसी बात करते हैं जैसे वह पूस की रात सरीखी आपकी दुश्मन हो। मुझे तो शीत ऋतु बहुत पसंद है।मुझे तो बसंत तब पता लगता है कि जब उसके नाम पर सुंदर फैशन परेड होने लगती है, और मेरी गर्ल फ्रैन्ड बोलती है कि अब नए फैशन की ड्रैस खरीदना है, और माध्यम से पता लगता है कि कौन से होटल में रंगीन डिस्को है और बढ़िया खाना पीना है।हम लोग तो बसंत ज़रूर मनाते हैं।हम तो ड्रैस तथा होटल बदलकर सभी उत्सव मनाते हैं। आज तो होटलों में जब चाहे बसंत बना लो और जब चाहे वर्षा ऋतु, और तो और ग्रीष्म ऋतु में बसंत बना लो।बस आपको पैसा बनाना आना चाहिये।”
उसका आत्मविश्वास मुझे चकित कर रहा था और एक दृष्टि से अच्छा भी लग रहा था।मुझे संदेह होने लगा कि मैं वास्तव में पिछड़ गया हूं।
मैं उसे कैसे बतलाता कि आम भारतीय तो प्रकृति के साथ रहने वाला है जो जानता है कि असल में बसंत तो ऋतुओं का राजा है।पूस के बाद तो बसंत सचमुच ही स्वर्गिक आनन्द देती है। किन्तु अब शायद गांवों में भी जहां टीवी पहुंच गया है, क्या बसंत वैसी ही मादकता देती है जैसे आम की बौर ! जब जंगल ही काटे जा रहे हैं तब कौन गा सकता है – केलिन में क्यारिन में, कुंजन में कछारन में बगर्यो बसंत है; पलाशन में पौन हू में बगर्यो बसंत है; मुझे तो अभी भी पलाशों के टेशुओं में बसन्त का रंग चमकता दिखाई देता है, और अवसर लगते ही मैं मध्य प्रदेश के जंगलों में भटकने पहुंच जाता हूं।
अवसर मिलने पर पास ही कुमांयूं गढ़वाल पहुंच जाता हूं सारे हिमालय पर बुरांशों की छाई मादकता का रसास्वादन करने; और वहां के लोक गीतों का आनन्द लेने। “बाल बुरांश शिव सिर शाबी”– कोमल बुरांश शिव के सिर की शोभा है।सौंदर्यमय भावनाओं से ओतप्रोत ‘फुलदेई‘ वसन्त उत्सव में लड़कियां प्रेम भरी भावनाओं को व्यक्त करती हुई गीत गाती हैं; घर घर जाकर।इन लोकगीतों को सुनने में मन प्रेम में डूबने उतराने लगता है – “धार मा फूले बुरांश को फूले मैन जाणे मेरी सरू छ – ‘पर्वत शिखर पर बुरांश का फूल खिला है; मुझे लगा वह मेरी प्रिया है।’ और सुना – ‘त्वै देखी नामा बुरांश लांदी रास’ – ‘प्रिये ! तुझे देखकर तो बुरांश का फूल भी तुझसे ईर्षा करता है।’ एक से एक प्रेम के रस में पगे – ‘ओंदी रया ऋतु मास्रफूलदा रया फूल’ –वसंत ऋतु आती रहे और फूल खिलते रहें। कितनी कोमल और सौंदर्यपूर्ण इच्छा है। चौफुला एक प्रसिद्ध नृत्य–गीत शैली है जिसमें गुजरात के गरबा; आसाम के बिहू; मणिपुर के रास आदि का प्रभावशाली मेल है। इसी शैली की एक विशिष्ट शैली का नृत्य है मयूर नृत्य जिसे कि महिलाएं बड़े उल्लास के साथ करती है। इस नृत्य के साथ गाया जाना वाला एक लोक प्रिय गीत इस प्रकार है :
ह्यूँचलि डाँड्यू की चली हिंवाली कँकोर
रंगमतु है, नचण लगे मेरा मन को मोर।
ह्यहिम शिखाओं से जैसे ही हिम की हवा चली; मेरा मन मयूर मस्ती से नाचने लगा।
धौली गंगा को छालूं पाणी भागीरथी का जोल
डेव प्रयाग रघुनाथ मंदिर नथुली सी पँवोर – ह्यूँचली . . . .
भागीरथी का मटमैला पानी है और धौली गंगा अर्थात अलकनंदा का जल स्वच्छ है। दोनों जब देवप्रयाग संगम पर रघुनाथ जी के मंदिर के पास मिलती हैं तो लगता है कि सुन्दरी की नाक पर सुशोभित होने वाली नथ का पँवोर ही राहृ है। मेरा मन मयूर. . . . .
आरू घिंगारू, बाँज, बुराँस सकिनी झका झोर
लखि पाखे बण माँग बिरड़ी चकोरी को चकोर – ह्यूँचली . . . .
आरूÊ घिंघारूÊ बाँजÊ बुराँस और सकिनी पर बसन्त ऋतु छा गई है और ऐसी ऋतु में चकोरी का चकोर खो गया है। मेरा मन मयूर. . . . .
डाँड की रसूली कुलैंई झुपझूपा चँवोर
उचि डाँडी चौडंडो बथोऊँ गैरी गंगा भँवोर – ह्यूँचली . . . .
पर्वतों में राँसुला चीड़; इस रंगीली ऋतु में इतना खिल गया है कि उसके चँवर बन गए हैं।
चारों ओर के पर्वतों से सुंगंधित हवा आ रही है।
उधर गंगा में पानी जिस तरह भँवर में घूम रहा है उसी तरह मेरा मन एक ही के चक्कर लगा रहा है।
मेरा मन मयूर. . . . .
वसुधारा को ठण्डो पाणी केदार को ठौर
त्रिजुगी नारैण तख बद्री सिर मौर – ह्यूँचली . . . .
यह धरती बद्री और केदार की है, त्रियुगी नारायण का स्थान है,
यहीं वसुन्धरा का ठण्डा पानी है जो सबकी प्यास बुझाता है,
इसलिए मेरी प्यास भी बुझेगी। मेरा मन मयूर. . . . .

कितना भरोसा है उसे अपने प्रेमी का और उसे आश्वासन देता है पूरा वातावरण। अपने पर्यावरण से कितनी तन्मय है वह प्रेमिका। एक दो और लोक गीतों के उद्धरण का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं :
उसे पर्वतों और वृक्षों से इतना प्रेम है और एक ओर उनके सहृदय होने का इतना भरोसा है कि वे उसके निवेदन को मान लेंगे। कालिदास के मेघदूत के ही समान वह अपने प्रियतम के पास मेघदूत भेजती है :
ऊँमा बथाई कलेजा की छाप
चुचा ले आई ऊँ थई अपणा साथ।
हे मेघ तुम उन्हें अपना काला रंग दिखाकर कहना कि तुम्हारे वियोग में तुम्हारी प्रेयसी का कलेजा भी जलकर काला हो गया है। और किसी तरह से तुम उन्हें अपने साथ ही ले आना।
अब तो फैक्टरियों की चिमनियों से निकलते धुएं की तरह मिल मालिकों के पास पैसा बहता आता है।अब तो बस पैसा ही बसंत बनाता है, और पैसा ही बसन्त मनाता हैॐ अब मैं अपने नाती को यह सब नहीं समझा सकता। वह कह देगा, “ क्या नाना जी ! मुझे बसन्त मनाने के लिये यह सब बुरांश या फ्यूँली के फूल नहीं चाहिये। बस वो ढब ढब की ताल हो, और मैं अपनी गर्ल फ्रैन्ड की कमर में हाथ डालकर, उसकी आँखों में बसन्त देख लेता हूं।”
नहीं, दुख की ही बात है कि अब वह नहीं समझ सकता। मुझे उससे बहुत पहले संवाद करना चाहिये था।
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