There was an error in this gadget

Search This Blog

Sunday, September 25, 2011

लगता मेला रोज़ है , सजती रोज़ दुकान।
चमक–धमक के बीच में, मेरी नन्ही जान।।

जोड़- तोड़ के दौर मेँ, ऐसे बने महान।
जूते या घिसते रहे, या फिर घिसे ज़ुबान।।

बांध सके यदि आप भी, तारीफ़ों के सेतु।
बिना किये कुछ काम ही,सभी आप के हेतु।।

दर –दर खाई ठोकरें, सीखी इतनी बात ।
दिल की दिल में राखिए, खुले नाही जज़्बात।।

गला काट प्रतियोगिता, चूहों की है दौड़ ।
जीत के भी चूहे रहे, फिर भी सब मेँ होड़।।

ऊंचा मैं तुझ से बहुत,तेरी क्या औकात।
अदब सियासत धरम तक,पग पग बिछी बिसात।।


अच्छे को अच्छा कहूँ ,छोटी है यह बात।
अच्छी अच्छी बात ही ,जीवन की सौगात।।
-राजमणि
Post a Comment