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Friday, September 23, 2011

वाह पथिक जी आप तो सचमुच मानव हैं



आपने हिंदी के तथाकथित विद्वानों की एकता और अखंडता के सन्दर्भ में जो कुछ कहा है यदि वो इस बात के महत्व को समझ लें तो वो लोग भी मानव बन सकते हैं जो हिंदी की सेवा करने की वजाय आत्म प्रसंसा में मुग्ध रहते हैं ।



पथिक जी आपने जो साहित्य की सेवा की है वो अविस्मरनीय है । समाज धीरे धीरे ही कबीर को पहचान पाता है। आपके ह्रदय में जलती हुई देशप्रेम कीआग कभी ठंढी न हो ये मेरी शुभकामना है ।






आपका बड़ा भाई



अभिषेक मानव
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