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Saturday, October 1, 2011

मन गीत-गीत हो गया


गीत-
ख्वाब में रोज़ आते तुम

ओढ़कर नींद की चादर ख्वाब में रोज़ आते तुम
रात के तानपुरे पर लोरियां-सी सुनाते तुम
महकते जाफरानों की रेशमी-सी हवाओं में
पत्तियों के हरेपन की ओसभीगी निगाहों में
बर्फ़ के सर्द पर्दे में कहीं हंसते-हंसाते तुम।

ओढ़कर नींद की चादर ख्वाब में रोज़ आते तुम
रात के तानपुरे पर लोरियां-सी सुनाते तुम।

हुस्न की आंच में दमके शोख चहरे ये लम्हों के
सुबह की रूह में जागे हजारों गीत झरनों के
बादलों के दरीचों से धूप-सा खिलखिलाते तुम।

ओढ़कर नींद की चादर ख्वाब में रोज़ आते तुम
रात के तानपुरे पर लोरियां-सी सुनाते तुम।

कभी चुप्पी के आंचल में छिपाकर फूल यादों के
प्यार के हाथ में थामे कभी कचनार वादों के
कभी होठों पर आहट के वहम-सा थरथराते तुम।

ओढ़कर नींद की चादर ख्वाब में रोज़ आते तुम
रात के तानपुरे पर लोरियां-सी सुनाते तुम।
पंडित सुरेश नीरव
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