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Sunday, October 23, 2011

१५ दिसंबर १९४१ को दो कारों में चार व्यक्ति आये।इनमें मेज़र फूज़ीवारा के साथ दो ज़ापानी और एक भारतीय प्रीतमसिंह थे। फूज़ीवारा ने मोहनसिंह से कहा कि वे अपने को तथा अपनी कमान के अंतर्गत सभी सैनिकों को स्वतंत्र समझें।युद्धबंदी नहीं।मोहनसिंह को सरकारी भवन अपने कार्यालय तथा आवास के लिए मिल गया।लगभग ३००भारतीय सैनिक मोहनसिंह के साथ हो गये।तीन दिन में यह संख्या एक हज़ार हो गयी।मेज़र फूज़ीवारा ने मोहनसिंह को आश्वस्त किया किया कि ज़ापान भारत पर बुरी नज़र नहीं रखता।मोहनसिंह ने फूज़ीवारा से अनुरोध किया कि भारतीयों के इस संघर्ष का नेतृत्व के लिए सुभाषचंद्र बोस को मलाया लाया जाये।फूज़ीवारा ने कहा कि ज़ापानी सुभाष को दो बार कांग्रेस अध्यक्ष रहने के कारण विश्वसनीय नहीं मानते।
३१ दिसंबर १९४१ को जनरल यामाशिता ने सभी भारतीय युद्धबंदियो को मोहनसिंह के हवाले कर दिया।मोहनसिंह ने भारतीय सैनिकों को लेकर विधिवत इंडियन नेशनल आर्मी का विधिवत गठन किया।उन्होने  अधिकारियों के क्लास खत्म कर दिये।देशभक्ति, सांप्रदायिक सौहार्द ,आत्मनिर्भरता,ड्रिल, शारीरिक प्रशिक्षण का नया कार्यक्रम शुरू किया गया।सामूहिक भोजनालय बनाये गये।आई०एन०ए० की  भाषा रोमनलिपि में हिंदुस्तानी निश्चित की गयी।
मोहनसिंह ने पुनः सुभाष को बुलाने पर जोर दिया।उन्होने आई०एन०ए० को ज़ापानी सेना के समान स्वतंत्र दर्ज़ा देने की भी मांग की और केवल भारतीय सीमा पर लडने की इच्छा ज़ाहिर की।आई०एन०ए० का मुख्यालय कुआलालम्पुर में स्थापित किया गया।आज़ाद हिंद फौज़ के गठन की कहानी
बाबू बुद्धसिंह जो बाद में मलाया के गांधी कहलाये आई०एन०ए० कैंप के सिविलियन क्वार्टर मार्शल नियुक्त किये गये।कुआलालमपुर में मुख्यालय खुलने के एक सप्ताह के भीतर आई०एन०ए० की पांच ब्रिगेड गठित कर एक रेज़ीमेंट बनायी गयी।   -------(क्रमशः)
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