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Monday, October 31, 2011

इतना न ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े

इतना न ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े।

जिस तरह हंस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्के-ग़म
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े।

एक तुम कि तुम को फिक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
एक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े।

मुदत के बाद उसने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े।

साक़ी सभी को है गमे- तशनालबी मगर
मय है उसी के नाम पे जिस के उबल पड़े।
कैफ़ी आज़मी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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