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Monday, November 7, 2011



प्रिय ब्लॉगर साथियों,
बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर उपस्थिति दर्ज करा रही हूँ कृपया अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएँ

डॉ. मधु चतुर्वेदी

कुछ यादें बरसों बरस ज़हन के किसी
सर्द कोने में –
बर्फ सी जमी होती हैं -
जिसकी ठंडक में भी
छिपी होती है, एक धीमी सी
तपिश जो लगातार -
कोशिश करती है, उस पर्त को
भेदने की – पर नाकामयाब,
सुलगती रहती है, अंदर ही अंदर
और एक लंबे अर्से के बाद -
अचानक कोई अलादीन
अनजाने ही या
जान बूझ कर, बरसों से,
लावारिस पड़े – ठंडी बर्फ के
उस आतशी चिराग को -
रगड़ देता है अपने जादुई
हाथों से और – जमीं हुई
यादें – धुआं – धुआं होकर बाहर आती हैं
और बाहर आते ही बदल जाती हैं,
एक करामाती जिन में
जिन - जो एक मीठा फरेब
देता है, आपको, आपका गुलाम
होने का पर -
आखरश आप हो जाते हैं उसके गुलाम!
उसके एक इशारे पर, ज़हन का
वह सर्द कोना यक ब यक बदल
जाता है उबलते लावे में -
और उस दलदली लावे में डूबने उतराने लग जाता है
आपका वज़ूद, राहत के
लिये छटपटाता कसमसाता!
पर यादों के उस तिलिस्मी जिन
की सख्त गिरफत
न तो आपको डूबने ही देती है न उबरने

डॉ. मधु चतुर्वेदी
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