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Thursday, November 17, 2011

महाकवि श्री भगवान सिंह हंस

आदरणीय भरत चरित्र महाकाव्य के रचयिता श्री भगवान सिंह हंसजी को मैं शत-शत नमन करता हूँ कि जिन्होंने समाज को एक ऐसी अमूल्य धरोहर दी है जो समाज को पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्तरोत्तर युग-युगांतर पखारती रहेगी. इनका यह भरत चरित्र महाकाव्य देश की सब विश्वविद्यालयों एवं पुस्तकालयों में अध्ययनरत है और इस महाकाव्य पर छात्र शोध भी कर चुके हैं. और तो और इस महाकाव्य के प्रकाशित होते ही छात्रा दीप्ति यादव ने  कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से  एमफिल कर डाली. अनेक धार्मिक स्थल मंदिर आदि में भी भक्तगण  इस महाकाव्य का नियमितरूप से पाठ कर रहे हैं. जिज्ञासुओं ने इस महाकाव्य को तीन-तीन, चार-चार बार पढ़ डाला. वे बताते है कि फिर भी  पढ़ने से दिल नहीं भरता है.  बड़ा आनंद आता है. दिल चाहता है कि बार-बार इसको पढ़ूं. मैं ऐसे रचनाकार यानी महाकवि को साधुवाद ही नहीं बल्कि उनके चरणों में माथा टेककर नमन करता हूँ. 
आपके दर्शनार्थ कुछ अंश--

भरत न सामिल सुन धर ध्याना. रहा केकय में गृह स्वनाना.
वह तो भक्त  मम बहुत प्यारा. है     वह    तो     निर्मल उद्गारा.
लक्ष्मण! ध्यान धरकर सुनो. उसमें भरत शामिल नहीं है. भरत उस समय अपने नाना के घर केकय में  था. वह मेरा परमभक्त तो मुझे बहुत प्यारा है. उसका तो बहुत ही निर्मल उदगार है.
वह भरत मुझे परम दुलारा . दूषित राज्य न मम स्वीकारा.
मन मैला न कर प्रिय कुमारा. राम   लक्ष्मण से   यों उचारा .
वह भरत मुझे परम दुलारा है. दूषित राज्य को मैं स्वीकार नहीं करूंगा. हे प्रिय लक्ष्मण! तुम मन मैला मत करो. राम ने लक्ष्मण से इस प्रकार कहा.
ऐसा सुनकर राम से, लखन   भरे   अरु  रोष.
बाण गहि कर कर फड़का, कहि उनका ही दोष.
राम से ऐसा सुनकर लक्ष्मण और रोष भरने लगा. और वाण को हाथ में लेकर वह फडकने लगा. तथा उसने उसका ही दोष बताया.

अमित



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