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Thursday, November 17, 2011

लाहौर वाली बस को करगिल रोक देता है-----------------------------------------

लडे जो ज़ुल्म से,अन्याय से वह वीर होता है
चले आगे ,दिखाये राह वह ही पीर होता है
पर ये कौन सी है राह जिसको तू दिखाता है
भूखों को गरीबो को तू ये क्या सिखाता है ?
ज़हर भरकर दिमागों मे जिन्हे हैवान कर डाला
अपनी साज़िशों की छांव मे हरदम जिन्हे पाला
लावारिस सड रही लाशें उनकी मुंह चिढाती हैं
कदम बरवादियों की ओर कौमें यों बढाती हैं
ये शैतानियत की सोच तुझको खाक के देगी
नफरतों की आग तुझको राख कर देगी
हम भाई समझते हैं-तू दुश्मन समझता है
हमारी नेकनीयती को तू उलझन समझता है
जब भी गले मिलते हैं खंज़र भोंक देता है
लाहौर वाली बस को करगिल रोक देता है---------------------
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