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Thursday, November 17, 2011

नफरतों की आग तुझको राख कर देगी

अरविंद पथिक
 अरविंद पथिकजी....
पाकिस्तान की नीयत और नियति दोनों पर आपने साधिकार लिखा है। 
कविता बहुत अच्छी है।
बधाई..
ये शैतानियत की सोच तुझको खाक केरदेगी
नफरतों की आग तुझको राख कर देगी
हम भाई समझते हैं-तू दुश्मन समझता है
हमारी नेकनीयती को तू उलझन समझता है
जब भी गले मिलते हैं खंज़र भोंक देता है
लाहौर वाली बस को करगिल रोक देता है-----
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