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Friday, December 16, 2011

मकबूल और उनकी गजल

श्री मृगेंद्र मकबूलजी



पालागन सर , बधाई, आपकी गजलों को पढ़कर मजा आ गया. शेरे-दिल शेर के   निम्न शेर बहुत ही पसंद आये- पुनः पालागन |



दुश्मन भले ही कुछ कहे दुनिया जहान में

पढ़ते रहो क़सीदे, तिरंगे की शान में।
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नूर उनका झिलमिलाता है, रंगों में देखिये

कुर्बान हो गए जो, तिरंगे की शान में।







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