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Monday, December 19, 2011

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


 बिस्मिलजी को याद किया
देश के औसत सुविधाभोगी बुद्दिजीवियों के लिए उनकी जिंदगी का एक मात्र लक्ष्य सिर्फ आयोजन के बहाने अपनी भड़ास निकालनाभर होता है। वे जब कोई कार्यक्रम पूरी तरह पक जाता है तो सूंघते हुए अपनी डायरी लेकर आयोजन स्थल पर प्रकट हो जाते हैं और आयोजन में अपनी कविताएं सुनाकर फिर चादर तान कर सो जाते हैं। उनकी कुंभकर्णी नींद तभी टूटती है जब फिर किसी कार्यक्रम की आहट उनके कानों तक पहुंचती है। हां यदि संयोजकों ने अखबारों में समाचार छपवा दिया तो अपना नाम ढूंढ़ने के लिए देशहित में थोड़ी देर के लिए वे अपनी आखें जरूर खोलते हैं। इन्हें न कोई बुलाता है और न इनकी कोई साहित्यिक हैसियत ही होती है मगर ये आत्ममुग्ध कथित कवि सोचते यह हैं कि हम अगर इनके कार्यक्रम में नहीं जाते तो इनका प्रोग्राम दो कौड़ी का हो जाता। कथित कवियों की इस हरामखोर जमात से अलग ऐसे भी कुछ फनकार हैं जिन्हें इस देश और इस देश के अमर शहीदों से प्यार है। कुछ ऐसे ही रचनाकारों ने अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जरिए ग्रेटरनौएड़ा के बिस्मिल उद्यान में बिस्मिलजी को न केवल श्रद्धापूर्वक याद किया बल्कि बिस्मिल साहित्य के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए पंडित सुरेश नीरव और अरविंद पथिक का सारस्वत सम्मान भी किया। गौरतलब है कि पंडित सुरेश नीरव ने सरफरोशी की तमन्ना नामक जहां बिस्मिल पर टेली फिल्म बनाई है वहीं अरविंद पथिक ने बिस्मिल चरित नाम से महाकाव्य की रचना की है। समारोह की अध्यक्षता वयोवृद्ध साहित्कार दयाप्रकाश सिन्हा ने की। मुख्य अतिथि थे-साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी। संस्था के अध्यक्ष मनमोहन क्रांत ने भी कविता के जरिए बिस्मिलजी को याद किया।
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