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Friday, December 16, 2011

क्रांतिवीर बिस्मिलजी के बलिदान दिवस पर


क्या बिस्मिलजी भाजपाई थे
आज के दौर में हर चीज़ को राजनीति के चश्में से ही देखा जाता है। अगर ऐसे दौर में देश के अमर शहीदों को भी यदि इसी नजरिए से देखा जाए तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। आज जिसके भी नाम के साथ राष्ट्रीयता का प्रभामंडल जुड़ा होता है उसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कार्यकर्ता करार देना छद्म बुद्धिजीवियों का शगल बनता जा रहा है। ऐसा करके वो किसी संगठन पर अहसान नहीं करते है बल्कि इस फिकरे और फतवे के जरिए वे अपनी अज्ञानता और अकर्मण्यता को ही छिपाते हैं। मुझे याद पड़ता है कि दैनिक हिंदुस्तान में एक लेख उन दिनों छपा था जब नरेन्द्रमोदी ने महानक्रांतिकारी श्यामजी कृष्णवर्मा की अस्थियां लंदन से राजकीय ससम्मान के साथ गुजरात मंगवाई थीं। पंडित श्यामजी कृष्ण बर्मा को तब महान साहित्यकार मृणाल पांडे ने संघ का कार्यक्रता लिख दिया था। उनका सोचना स्वाभाविक था। जिस काम को नरेन्द्र मोदी करेंगे वो संघ से अतिरिक्त भला  और क्या और क्यों होने लगा। जबकि तथ्य ये है कि संघ की स्थापना ही श्यामजी कृष्ण बर्मा के जीवनकाल में नहीं हुई थी। और लंदन स्थित उनके आवास इंडिया हाउस में तब स्वयं महात्मा गांधी भी राजनीति के गुर सीखने जाया करते थे। सविनय अवज्ञा का सूत्र उन्हें वहीं श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ही दिया था। लाला हरदयाल, चंपक रमण पिल्लई,मेडम भीकाजी कामा,मदन लाल ढ़ींगड़ा और वीर सावरकर के अलावा पंडित जवाहर लाल नेहरू भी इंडिया हाउस जाया करते थे। ये वो दौर था जब श्यामजी कृष्णवर्मा का घर क्रांतिकारियों का पावर हाउस हुआ करता था। उनकी अस्थियां लाने का कार्य चूंकि एक संघ से संबद्ध व्यक्ति ने कर दिया तो आज के महान बुद्धिजीवियों ने उन्हें ही संघ का कार्यक्रर्ता घोषित कर अपनी विद्वता का परिचय दिया। उल्लेखनीय है कि चंपक रमण पिल्लई की अस्थियां भारत के विद्वान राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ.राधाकृणन के सद्प्रयासों से भारत लाई गईं थीं।  वे दार्शनिक थे। और देशभक्तों की विराटता को जानते थे। अब बात पंडित रामप्रसाद बिस्मिलजी के बारे में। मैंने जब पंडित रामप्रसाद बिस्मिलजी पर टेली फिल्म बनाने का निश्चय किया और उनके चित्र को लेने फोटो लायब्रेरी पहुंचा तो  इंचार्ज कन्या ने इतराते हुए पूछा- हू इस दिस बिस्मिल। जब मैंने गुस्से में कहा कि आप ने बिस्मिलजी का नाम नहीं सुना तो उसकी कुलीग ने कहा अरे वही फिल्मी गीतकार बिस्मिल... सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है के राइटर। ये है हमारे देश के  तथाकथित प्रबुद्ध निवासियों का अपने शहीदों के प्रति ज्ञान। तो ऐसे माहौल में यदि भाजपाई मुख्यमंत्री साहिबसिंह बर्मा जिन भी क्रांतिकारियों के लिए काम कर रहे थे काग्रेस के मैनेजर्स उन्हें स्वाभाविकरूप से भाजपाई माने लें तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अरविंद पथिक जैसे प्रबुद्धों को यह बात पीढ़ा पहुंचा सकती है। मगर राजनीति में सेना के कफन और ताबूतों पर कमीशन खानेवालों को लिए ऐसी  ओछी और निर्रथक बातों का क्या मतलब। राजनीति के आधार पर हुई नियुक्तियों के नवरत्नों से आप और क्या उम्मीद करते हैं। इनके लिए चापलूसी के आगे जनता-जनार्दन भेड़-बकरी से ज्यादा कुछ नहीं होती। आज के दौर में तो स्वर्गीय संजय गांधी भी इनके लिए भाजपाई ही हो गए हैं। इनके लिए जो मर गए उनकी प्रशंसा एक भावुक मूर्खता का काम है। आप कर रहे हैं। आप को तो क्या जब बिस्मिलजी को ही वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे तो आप हैं किस खेत की मूली। मैं यही कहना चाहूंगा कि
खेल नंगेपन का पूरी शान पर है
देश का यारो पतन उत्तान पर है।
काकोरी कांड के अमर नायक और क्रंतिकारी कवि पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को उनके बलिदान दिवस पर कोटिशः प्रणाम.. ।
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