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Friday, January 6, 2012

भारत के दर्शन के आगे

अऱविंद पथिक
आज ब्लॉग पर साहित्यिक दिग्गजों की उपस्थिति देखकर मन प्रसन्न हो गया। मेरा भूल-बिसरा साक्षात्कार श्री अरविंद पथिक ने निकाल लिया इसके लिए आभारी हूं।
पं० सुरेश नीरव---
पथिक जी विज्ञान का विद्यार्थी होने  के चलते मैं वैज्ञानिक या सैनिक कुछ भी बन सकता था पर लेखन से तब भी जुडा रहता क्योंकि लेखक कोई बनता नहीं है।वह तो होता है,बिना हुये कोई लेखक बन नहीं सकता।लेखन जिसकी आंतरिक ज़रूरत बन जाता है वह लेखक बनने से कैसे बच सकता है? शायद इसलिये मैने लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का साधन चुना।हो सकता है अभिव्यक्ति ने भी अपने को अभिव्यक्त करने के लिये मुझे माध्यम के रूप में चुना हो।
श्री बी.एल.गौड़
 श्री बीएल गौड़ साहब 
आपने गीतों के राजकुमार भारतभूषण को जिस भावुक अंदाज़ में याद किया है उसे पढ़कर आंखें भर आई। यह काम आप ही कर सकते हैं क्योंकि आप शब्दों के अनन्य साधक हैं।
एक सितारा टूटा नभ से जाने कहाँ गया
वह गीतों का हरकारा जाने कहाँ गया

हिंदी गीत के पुरोधा , अद्वितीय गीतकार श्री भारत भूषण यों तो १७ दिसम्बर, २०११ सांय चार बजे इस दुनिया को अलविदा कह कर चले गए, पर वास्तविकता तो इससे परे है। मैं समझता हूँ जब तक हिंदी गीत विधा जीवित रहेगी तब तक मोजूद रहेंगे हम सबके बीच भाई भारत भूषण
श्री विश्वमोहन तिवारी
नोबेल पुरस्कृत कवि टी. एस इलियट :
भारतीय दार्शनिकों के सूक्ष्म चिन्तन के सामने अधिकांश महान यूरोपीय दार्शनिक स्कूल के बालक से दिखते हैं। . . . .
चार्ल्स लैनमैन के शिष्यत्व मे दो वर्ष संस्कृत की शिक्षा, तथा एक वर्ष जेम्स वुड के मार्ग दर्शन में पतंजलि के योगशास्त्र के अध्ययन ने मुझे आत्मज्ञान के प्रकाश में ला दिया। 
श्री विश्वमोहन तिवारीजी
आप भारत को जानो के माध्यम से सचमुच दी लोगों को भारत की अनमोल विरासत से परिचित कराने का काम कर रहे हैं। आप जयलोकमंगल को उपकृत करें इसे धारावाहिक देकर। मेरी शुभकामनाएं। 
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