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Friday, January 27, 2012

कभी मन की भी तो सुनो


तीन दिन लगातार ब्लॉग की दुनिया से बाहर रहना पड़ा। कारण रहा मेरा कोटा प्रवास। वहां मेरी बहन-जीजाजी का आवास है। जीजाजी काफी बीमार चल रहे थे। मगर उन्हें अस्पताल से घर ले आया गया था। मुझे सूचना दी गई कि वे अब ठीक हो रहे हैं। आप  अब अपनी सुविधानुसार आएँ। मगर मुझे पूर्वाभास कुछ और हो रहा था। उसी दिन गाजियाबाद में ब्राह्मणसभा ने मुझे अभिनंदित भी किया था। हाथ में शॉल और प्रतीक चिन्ह थे मगर मन में एक अघोषित बवंडर था। मैंने  खुद ही नहीं अपनी पत्नी को भी अचानक साथ चलने के लिए कहा। उसे मेरे पूर्वाभासों का तजुर्बा है। इसलिए बिना किसी ना-नुकुर के वह भी तत्काल चलने को तैयार हो गई। देहरादून एक्सप्रेस से अभी हम लोग श्रीगंगानगर ही पहुंचे थे कि खबर मिली कि जीजाजी नहीं रहे। उन्होंने आखिरी सांस 5.30 बजे सुबह ली। और 7.30 पर हम लोग कोटा पहुंच गए। सोचता हूं कि अगर उनके घरवालों की बात मान लेते तो क्या हम ग़ाज़ियाबाद से चलकर उनकी अंत्येष्ठी में शामिल हो सकते थे। क्या जो हमारा मन कहता है हमें उसकी नहीं सुनना चाहिए। मगर हम कब-कब अपने भीतर की आवाज़ को तरजीह देते हैं। सूचना और सत्य एक नहीं हैं। इसलिए सूचनाएं हमेशा सत्य भी नहीं होती हैं। भले ही हम सूचना प्रोद्यौगिकी के युग में ही क्यों न रह रहे हों। अश्वत्थामा हतो एक सूचना ने महाभारत की कथा ही बदल दी। जबकि सत्य नरो वा कुंजरः में छिपा हुआ था। यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूं ताकि मेरे दोस्त भी अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ को सुनने का समय निकालना जरूरीरूप से जल्दी ही शुरू कर दें। क्योंकि मन ही देवता है। मन ही ईश्वर है।
मेरे प्रणाम..
विनयानवत
पंडित सुरेश नीरव
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