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Saturday, January 28, 2012

वसंत पंचमी शुभ हो

भरत भू को आज स्वयं तू
भ्रष्टमुक्त कर दे

वसंत परा प्रकृति का शैशवकाल है। यह पृथ्वी का निर्दोष काल है। देवताओं की ऋतु है-वसंत। वसंती रंग,वसंती वायु,वसंती बहार। चारों ओर वसंत के उत्सव का दृश्य। इसकी अनुभूति प्राणों में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार करती है। बुद्धि से चलकर आत्मा तक जानेवाली डगर का रंग ही वसंती है। ऋतु वसंती आत्मा और बुद्धि पर ऐसी छवि अंकित करती है जैसे प्रभु की छवि अंकित हो गई हो। यही आत्मरूपण का स्फुरण है। इसलिए जिज्ञासु सरस्वती से ज्ञान मांगते हैं तो क्रांतिकारी मेरा रंग दे वसंती चोला कहकर स्वतंत्रता का वरदान मांगते हैं। आइए आज हम मां सरस्वती से अपने देश के लिए एक भ्रष्टाचारमुक्त लोकतंत्र का वरदान मांगे।
वर दे वीणावादनी वर दे
भरत भू को आज स्वयं तू
भ्रष्टमुक्त कर दे
वर दे वीणावादनी वर दे..।

पंडित सुरेश नीरव
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