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Monday, February 13, 2012

बौनों के शहर में


मित्रों यह कविता तब लिखी गयी थी जब मैं बीस का होता था।मेरे प्रथम काव्यसंग्रह 'मैं अंगार लिखता हूं'कि यह कविता मुझे आज भी पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक लगती ।आपकी क्या राय है  बताइयेगा-------------

एक दिन पहुंच गया मैं बौनों के शहर में
बौनों का समूह मुझे देखकर ऊपर से हंसा
अंदर से घबराया
आप यकीन मानिये
उस दिन ज़िंदगी में पहली बार मुझे
अपने ऊंचे कद पर बहुत रोना आया
सचमुच,मैं मन ही मन बहुत शरमाया---------
मुझे लगा बौना होने में ही जीवन की
सार्थकता है
क्योंकि,यदि आप ऊंचे हैं तो आसमान को छुने की
कोशिश करेंगे
असफल होने पर झूंझलायेंगे
झल्लायेंगे
और आसमान की ऊंचाई के आगे जब
खुद को बौनों पायेंगे तो फिर कहां जायेंगे?
किस ज़मात में शामिल होंगे?
बौने से तो आप भागेंगे या फिर
वे आपको भगा देंगे
अपनी ज़मात में तो वे आपको किसी कीमत पर नहीं लेंगे
तब क्या करेंगे आप?
बिना ज़मात के आपको घास कौन डालेगा?
लोकतंत्र है हमारे देश में
और यह तंत्र उनका ही साथ देता है जिनके साथ
लोक होता है,ज़मात होती है
बौनों के इस शहर में --------
आप अपनी कोई ज़मात,गुट,यूनियन
या फिर कोई कमेटी या सोसाइटी
कुछ भी तो बना नहीं पायेंगे
फिर अपनी एकमात्र थाती
अपनी ऊंचाई को
राज़नीति में कैसे भुनायेंगे?
आप अकेले को तो आरक्षण भी नहीं मिल पायेगा
स्वयं को अल्पसंख्यक या पिछडा घोषित करने की
राह में आपका ऊंचापन बहुत आडे आयेगा
आप कोई परिंदा या ज़ानवर भी नहीं हैं
जो दुर्लभ प्रज़ाति का होने के कारण आपको संरक्षण दिया जायेगा,
बौनों के इस शहर में
ऊंचा होना हेय है
घृणा के लायक है
सामाजिक ज़ुर्म है
क्योंकि ,ऊंचेपन के कारण
यदि आप कुछ स्वाभाविक लाभ पा जाते हैं
तो वह आपकी योग्यता ,
मेहनत और क्षमताओं का प्रतिफल न मानकर
बौनों के हक पर इक विदेशी
द्वारा डाला गया डाका ही कहलायेगा
और आपका ज़ीवन अगर
 सामान्य कठिनाइयों से
ही उबर नहीं पाया तो----
'लंबे आदमी की अक्ल घुटनों में होती है'
वाला मुहावरा ही चरितार्थ समझा जायेगा
मैं तो आदत से मज़बूर हूं लोग कहते हैं
बहुत बडा सूर हूं
भले-बुरे का फर्क नहीं कर पाता हूं
अगर समय रहते बौना नहीं बन पाया तो
मुफ्त मेम मारा जाऊंगा
मुझे भी लगने लगा है
कि लोग ठीक ही कहते हैं
बौनों के इस शहर में वाकई
सभी बौने रहते हैं
ऐसे में मैं यहां ज़्यादा दिन टिक नहीं पाऊंगा
कुछ भी हो पर इतना तय है
कि मैं चाहकर भी बौना नहीं पाऊंगा
मगर,आप तो बुद्धिज़ीवी हैं
ज़िंदगी को परिस्थितियों के हिसाब से
ढालना जानते हैं
आपको आदर्श और यथार्थ में संतुलन बिठाना आता है
इसलिये आपका ऊंचा कद बौनों के इस शहर में
आपकी प्रगति को अवरूद्ध नहीं करेगा
क्योंकि ज़रूरत पडने पर आप बौना बनने
से नहीं हिचकिचायेंगे
औृ जब अपने शहर को जायेंगे
तो अपनी इस मौलिक प्रतिभा के कारण 
और भी ऊंचे हो जायेंगे
बडी ईर्ष्या होती है आप से
आपके सामंजस्य के अद्भुत गुण से
कभी -कभी लगता है
कि मैं तो बिलकुल नाकारा हूं
मगर विवश हूं कि मैं यह नाकारापन
चाहकर भी छोड नहीं पाऊंगा
मिटना मंज़ूर है मुझे

पर अफसोस बौना नहीं बन पाऊंगा।
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