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Friday, February 17, 2012

पानी गंगाजल का इतिहास है


एक पानीदार कविता
पंडित सुरेश नीरव
पानी हमेशा पानीदार रहता है
क्योंकि पानी ऊंचाइयों में रहकर भी
नीचे की तरफ बहता है
कितना सहज,सरल और तरल होता है पानी
जो प्यास को भी प्यासा देख दूर से ही उसे टेरता है
और जिनका पानी उतर जाता है उन पर ऐसा पानी फेरता है
कि पानी खुद एक कहानी हो जाता है
और बड़े-से-बड़ा बेशर्म भी पानी-पानी होजाता है
 ये पानी जब-जब क्रुद्ध हुआ है
तब-तब घाट-घाट का पानी पिया खांटी चंट भी
इसके सामने आने में घबराया है
क्योंकि पानी ने अच्छे-अच्छों को पानी पिलाया है
और जिसने अपनी कमाई को पानी की तरह बहाया है
पानी ने नाराज़ होकर उसे बूंद-बूंद को तरसाया है
पानी अब सर से ऊपर गुजरने लगा है
क्योंकि आज आदमी अपनी ही बात से मुकरने लगा है
जब से वचन निभाना पिछड़ेपन की निशानी हो गया है
तबसे आदमी का खून भी पानी हो गया है
जो पानी को पानी पी-पीकर कोसते हैं
 सच वे कितना ओछा सोचते हैं
समझो उनकी भैंस गई पानी में
ये डूब मरें चुल्लूभर पानी में
अरे लड़खड़ती सांसों के भूगोल में
पानी गंगाजल का इतिहास है
और करवा चौथ के व्रत में पानी सुहागन की आस है
अरे तब तक नहीं डूबेगी ये पृथ्वी
जबतक इस पृथ्वी का पानी में विश्वास है।
(समय. सापेक्ष हूं संकलन से)
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