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Friday, February 24, 2012

समय सापेक्ष व्यंग्य हैं 
सुरेश नीरव के
मैंने सुरेश नीरव के व्यंग्य संग्रह टोपी बहादुर को पढ़ा। और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ये व्यंग्य
पाठकों और लेखकों एक बौद्धिक कसरत की अपेक्षा रखता है। जनता को मौके के मुताबिक टोपी पहनाने और टोपी उछालने में माहिर भ्रष्ट,पाखंडी और
कुर्सीलोलुप टोपीबहादुर नस्ल के खलपुरुषों के तिलिस्मी छद्म का ध्वंस
करते हुए भौतिक-रासायनिक प्रतीकों से लैस इनके समय सापेक्ष व्यंग्

दुर्घनाग्रत इंसानियत की अस्मिता की सतर्क पड़ताल करते हुए हमें
वक्रोक्ति के उस अचीन्हे रचनालोक की शिनाख्त कराते हैं जिसकी नागरिकता
लेने की काबिलियत सिर्फ-और-सिर्फ फितरत की कबीरियत होती है। मोहभंग के
कुहासे को काटने के लिए जिस चुस्ती-फुर्ती और मुस्तैदी की जरूरत होती है,
यकीनन इस संग्रह के व्यंग्य उस जरूरत से रू-ब-रू कराने की एक सार्थक,
ईमानदार और सफल कोशिश हैं। सुरेश नीरव के व्यंग्यों की शैली रोचक है और तथ्य महत्वपूर्ण। मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक इन व्यंग्यों का उतना ही आनंद उठाएंगे जितना कि इन्हें पढ़ते हुए मुझे आया है। मुझे और सभी पाठकों को इनके अगले व्यंग्य संग्रहों की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी

-गोपाल चतुर्वेदी
(सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार)
महाराणाप्रताप नगर,लखनऊ
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