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Tuesday, April 3, 2012

कविताएं तो विद्रोह की अग्नि-ध्वजा हैं


अंतर्द्वंद्व (काव्य संग्रह)
कविः राकेश चंद्र जुगरान
देहरादून

भूमिका-
परिवर्तन की अग्नि-ध्वजा कविताएं
कविता अपने समय से मुठभेड़ करती हैं और पूरी दमखम के साथ समय की आक्रामकता से टकराती हैं इसलिए ही कविता कविता होती है। अहसास के आंवे पर संवेदनाएं कई-कई दिनों तक जब धीमी-धीमी आंच में सिंकती-पकती हैं तब वे कविताओं की शक़्ल अख्तियार करती हैं। इस आंवे में दर्ज होते हैं- हमारे सुख-दुख,उल्लास-अवसाद, जंगल-पहाड़,नदी-झरनें,कुंठा-क्रोध,विवशताएं और अनेक अनाम,अघोषित अंतर्द्वंद्व। राकेश चंद्र जुगरान के तो काव्य-संग्रह का शीर्षक ही है- अंतर्द्वंद्व। ऐसा लगता है जैसे कि अहसास की बहुवर्णी वेबसाइट्स का सजा-धजा इंटरनेट हों ये कविताएं। जिनमें पहाड़ों की विराटता है,झरनों और नदियों का अपनत्व है,पक्षियों का कलरव है,फूलों की खुशबू है साथ-ही-साथ प्रकृति के इस खूबसूरत लैंडस्केप के नेपथ्य में हांफती-कसमसाती पहाड़ी जीवन की दुर्दांत सचाई भी है। बेहतरीन कवि होने की पहली शर्त है-एक अदद यायावर मन। और इस रचनात्मक शर्त को बखूबी पूरा करते हैं-राकेश। जो न केवल हिमालय बल्कि देश की सीमाओं के पार मॉरीशस और श्रीलंका के भाव-भूगोल से भी पूरी सतर्कता और तन्मयता के साथ रू-ब-रू हुए हैं। प्रकृति के प्रति पूरे अहोभाव से भरा यह कवि-मन सर्वप्रथम प्रकृति को ही प्रणाम करता है-
नटखट लहरें लेतीं उछाल
देखो हिरणी-सी चपल चाल
किलकिल होता है सुर और ताल
आलोकित सौंदर्य विशाल
तन-मन को देती शीतलता
मां तुम बहती हो निष्काम
स्वीकारो जग का प्रणाम
स्वीकारो सत-सत प्रणाम।
अनुभूति और लय से सराबोर चेतना की धमनियों और शिराओं में बजता यह प्राकृत संगीत अचानक चीख में बदल जाता है। जब कविमन तथाकथित सभ्यता के नृशंस अत्याचारों से घायल हुई नदी जिसे कि वह अपनी मां ही मानता है,अपने वजूद का पर्याय मानता है उस नदी को प्रदूषण के नागपाश में छटपटाता हुआ देखता है। तब बरबस ही वह बोल पड़ता है-
छीना तेरा बचपन,जवानी छीन ली तेरी रवानी
हाय मां के साथ धोखा, युगों का प्रवाह रोका
तू सभी के पाप धोती मन-ही-मन में आप रोती
तू व्यथा किससे कहेगी,कब तलक सहती रहेगी।
विकास जब विनाश की मुद्रा में आ जाए,संबंध जब अनुबंध बन जाएं और मानवीय मूल्य चरित्र की मुट्ठी से रेत के कणों की तरह छीजने लगें,तब बड़ी शिद्दत से याद आता है  भटकते मन को अपना गांव-
मेरा गांव है शहर से दूर
जहां हर शक्ल पर है नूर
धारे-पनधारे,बरगद की छांव
सच में स्वर्ग से सुंदर है मेरा गांव।
गांव की यह नर्म-मुलायम याद इस बात का सबूत है कि अंतर्द्वंद्व का कवि अपनी सामाजिक चेत के प्रति कतई अचेत नहीं है। बल्कि पूरे दमखम के साथ वह अपने सार्थक हस्तक्षेप से विद्रूप की तहों को खंगालकर संघर्ष के पृष्ठों पर जीत की गाथा लिखने के आदमकद तेवरों से बाकायदा लैस है। भले ही संकल्प के पहाड़ों पर कितने ही गर्दिशों के पहाड़ टूटें और मुश्किलों के बादल फटें। मगर यह पथिक अपने पथ से कैसे डिग सकता है, जिसने कि पगडंडियों से धीरज का पाठ पढ़ा हो और बढ़ते जाओ-बढ़ते जाओ का प्रयाण गीत खुद हवा जिसके कानों में हर पल गुंजाती हो। झूठ के राजपथ पर मदमस्त चाल में टहलकदमी करता तिकड़मी लोकतंत्र आज हमारी निजता ही नहीं हमारे संस्कारों को भी झपटने को आमादा है तब मानवीय समीपता और मनुष्य की संप्रभुता की सुरक्षा के लिए राजेश चंद्र जुगरान की कविताएं बदलाव का कारगर हथियार बनकर खड़ी हो जाती हैं-
हे शेषनाग तू भी फुंकार थऱथर ब्रह्मांड तांडव अपार
कर धनुटंकार भर-भर हुंकार खड़ग उठा दानव संहार।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि हड़्डी टूटे विचारों की जो समय-सापेक्ष मर्मांतक पुकार है, इस संग्रह की कविताएं उन आहत विचारों की मददगार बनकर सामने आईं हैं। ये कविताएं परिवारजनों द्वारा छलपूर्वक वृंदावन में छोड़ दी गईं निरीह विधवाओं की मानिंद  अवश और परवश नहीं है बल्कि ये कविताएं तो विद्रोह की अग्नि-ध्वजा हैं जो आत्ममुग्धता के छद्म को पराजित कर बदलाव की सेना भी खुद-ब-खुद जुटाती हैं। कारण की प्रतिष्ठा और कारक के मान के लिए परिणामों की प्रचीर पर लहराती इन अग्नि-ध्वजा कविताओं की विजययात्रा में पूर्वाग्रहों के निष्ठुर मौन को तोड़कर आइए हम सब खुले मन से शरीक़ हों। इस मंगलकारी आह्वान के साथ.....
                                                      विनयावनत
                                                   पंडित सुरेश नीरव
                                                 (विख्यात कवि एवं पत्रकार)

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