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Tuesday, April 3, 2012

जेल बोध की दो रचनाएं

आज इत्तफाक है कि दो रचनाएं ब्लॉग पर पढ़ी और दोनों ही रचनाएं जेल बोध पर है। एक में गर्भपात है तो दूसरे में मूल्यों की भ्रूण हत्या।
एक शब्दिका है और दूसरी गजल। कवि भविष्यद्रष्टा होता है। लगता है दोनों कवियों ने हुक्मरानों का भविष्य देख लिया है।
महावीर जयंती की बधाई..
पंडित सुरेश नीरव
गर्भपात के 
खेल मे-----
मंत्री महोदया 
पद से 
सीधे जेल में------- 
घर से बाहर और बाहर से बहुत बाहर तलक
छा गया तम घना गहरा और हम सदमें में हैं
जेल से छूटे तो     सीधे जेल मंत्री बन गये
ज़श्न में डूबा शहर है और हम सदमें में हैं
इतने बरसों बाद भी वे, झूठ पर कायम रहे
सच झुकाये सिर खडा है और हम सदमें में हैं
'पथिक' जब से मंज़िलों की बात करने लग गये
रास्तों ने की बगावत और हम  सदमें में हैं,
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