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Sunday, July 1, 2012

केंचुये शिखर पर तने हुये बैठे हैं





बांग्लादेश और पाकिस्तान द्वारा हमारे सैनिकों के प्रति नृशंसतापूर्ण व्यवहार के प्रतिकार मे उन दिनों एक कविता लिखी थी आज फेसबुक पर कुछ मित्रों ने ज़ाबांजों की फोटो शेयर की तो वह कविता शेयर करने का मन हो गया।तत्कालीन परिस्थितियों को याद कर कविता पढें ---


केंचुये शिखर पर तने हुये बैठे हैं 
कायर,लोलुप नीच दर्प से ऐंठे हैं 
अपमान राष्ट्र का कोई भी कर जाता है
भारत बांग्ला देश से भी डर जाता है,
अरे पतन की और भला क्या सीमा होगी?
सोचो कितनी दुखी आज भारत मां होगी?
मुझ पर होते वार और यह मौन बना है
सोच रही होगी मैने यह किसे जना है?
यह नही है मेरा पुत्र नीच व्यापारी है
जीती इसकी लोलुपता ममता हारी है
राष्ट्र प्रेम की बातों से छलता है
अपमानों की आग में भारत जलता है
रोता है आर्यावर्त दुखी मानवता है
क्या किसी देश का सैनिक यों भी मरता है?
क्या कसूर था? वे तो मातृभूमि के रक्षक थे
मां की आंखों के तारे ,शत्रु को तक्षक थे
जब दुष्टों ने उनके केशों को नोचा होगा
भारत लेगा प्रतिशोध उन्होने सोंचा होगा
निश्चय ही अस्तित्व बांग्ला खोयेंगे
हम दुश्मन के लोहू से कलंक धोयेंगे
आंखें जब फोडी होंगी ,उन हत्यारों ने
जब वार नृशंस किये होंगे मक्कारों ने
स्वर्गस्थ शहीद भी निश्चय ही हुंकारे होंगे
और विवशता से सिर पटके होंगे मारे होंगे
राजनीति कुत्सित,गंदी औ नीच हुई
सिद्ध  हुई हत्यारी गर्हित कीच हुई
अगर देश में कहीं जरा भी जोश बचा
युवा जन तुममें किंचित भी रोष बचा
दो खींच गलीचे बिछे जो नीचे पांवों के
 दो पलट तख्त इन भ्रष्ट नीच नेताओं के
भारतमाता तुमसे अब बलिदान मांगती है
फिर से वापस भारत का सम्मान मांगती है
                                 अरविंद पथिक
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