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Sunday, August 19, 2012

सम्यक नजरिए की रोशनी थे-राजीव गांधी।

आज जन्मदिवस पर विशेष-
इक्कीवीं सदी के भविष्यदृष्टा
राजीव गांधी
पंडित सुरेश नीरव
अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर आगत अतीत के आकाश को छू लेने के हुनर का नाम था-राजीव गांधी। जो परंपरा की धरोहर थी उसे सहोजने और भविष्य के अज्ञात खजाने में रखे नए सोच के रत्नों से देश को कर देने के सम्यक नजरिए की रोशनी थे-राजीव गांधी। अतीत के आचार और भविष्य के विचार उनकी धड़कनों में बसते थे। अपनी लगन से इस देश की ज़मीन पर कंप्यूटर क्रांति और संचार क्रांति को जो पौधे उन्होंने रोपे थे,आज वह छतनार वृक्ष बन चुके हैं। घर-घर में कंप्यूटर और हर हाथ में मोबाइल इस भविष्यदृष्टा का सपना था,जो पूरी हनक के साथ पूरा हुआ। जिन्होंने कभी राजीव गांधी की इस सोच का मज़ाक उड़ाया था,वो खुद अपने कुनबे के साथ इस कामयाबी का आज बेझिझक इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि नएपन का,नए विचार का हमेशा और हर दौर में विरोध हुआ है। नए विचारों के कारण राजीव गांधी का भी हुआ। क्योंकि पुरातनपंथी नए तजुर्बे से हमेशा डरते हैं। मगर भविष्यदृष्टा तो समय से आगे के कलैंडर की भी तारीखें पढ़ लेते हैं। राजीव गांधी भविष्य की जो इबारत पढ़ रहे थे उसे पंडित जवाहरलाल नेहरू से विरासत में मिली क़लम को इंदिरागांधी की शहादत की सुर्ख स्याही में डुबोकर वह लिखने को बेताब थे। आसमान की सेवा में लगे इस कर्मयोगी को हवाओं ने न्यौता दिया था, देश की ज़मीन की सेवा करने के लिए। पॉलिटिक्स की ज़मीन पर पायलट को उतरना ही पड़ा। भारत माता की सेवा में लगी मां असमय ही अपने दूसरे पुत्र की मृत्यु से नितांत अकेली हो गईं थीं। 20 अगस्त 1944 के इतवार को सुबह 8.22 पर मुंबई में जन्मे राजीव गांधी को अपनी मां और भारत मां दोनो के ही फर्ज़ निभाने थे। राजनीति उनके लिए शौक नहीं रही मगर आज चुनौती थी जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से स्वीकार कर लिया। उनकी आंखों में चुनौतियों से जूझने का अदम्य संकल्प था। वे अभिमन्यु थे जिसने राजनीति के चक्रव्यूह को भेदने की कला गर्भ में ही सीख ली थी। कुशल योद्धा की तरह राजनीति के रणक्षेत्र में उतरे राजीव गांधी। आतंकवाद में झुलसता पंजाब,उल्फा की यातनाओं से कराहता असम, लिट्टे के खूनी पंजे में कसमसाता श्रीलंका,गृहयूद्ध के अखाड़े में औंधा पड़ा मालद्वीप सभी मदद के लिए गुहार कर रहे थे इस नौजवान योद्धा से। पिपक्ष के पराजित योद्धा लामबंद होकर हाहाकारी अट्टहास कर रहे थे,इस योद्धा का मनोबल तोड़ने के लिए। और दूसरी तरफ अथाह जनसमुदाय विकास के तोहफों की मांग कर रहा था,इस योद्धा से। देश को तोड़ने की साजिश के ताने-बाने बने जा रहे थे। जिसे नाकामयाब करने में इस योद्धा की मां को शहीद होना पड़ा। देश प्रतिशोध की आग में भीतर-ही-भीतर सुलग रहा था। यूयते-दरकते और झुलसे राष्ट्र को इक्कीसवीं सदी में ले जाने का शंखनाद कर दिया इस योद्धा ने। राजीव गांधी को मालुम था कि आर्थिक परिपक्वता के बिना राजनैतिक आजादी विकलांग है। लड़खड़ते लोकतंत्र को विकास की छड़ी चाहिए। पर्यावरण के जर्जर किले में दुबके जल-जंगल और जमीन को दुलारकर फिर तंदरुस्त करना होगा। प्रदूषण के जहर से मूर्च्छित नदियों को शुद्धीकरण के नुस्खों से फिर सेहतमंद करना होगा। बीड़ा उठाया नदियों के शुद्धीकरण का। गांव के विकास का रास्ता खोला-पंचायती राज से। शहर और गांव के फासले को पाटने के लिए दिल्ली के अशोका होटल में किया पंचायत-प्रतिनिधियों का सम्मेलन।  नौजवान पीढ़ी की विकास में सक्रिय भागीदारी तय करने के लिए 18 साल में दिया उन्हें मतदान का अधिकार। भारत की सांस्कृतिक धरोहर से दुनिया के देशों को रू-ब-रू कराने के लिए भारत महोत्सव के कराए आयोजन। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर की जी-15 की स्थापना। अमेरिका में जाकर किया अमेरिकी नीतियों का विरोध। और जताई भारत की ताक़त। देश को दिया इक्कीसवीं सदी में जाने का मूल मंत्र। रोक दी बगावत की आग। पंजाब में करवाया ऐतिहासिक समझौता। स्त्रियों को दिलाई सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की गारंटी। राजीव गांधी हमेशा कहा करते थे कि देश के विकास का बोझ उठाने का आनंद हम सब आपस में बांटकर उठाएंगे। उन्होंने जनता-जनार्दन के प्यार के आगे सुरक्षा घेरे को हमेशा बेमानी समझा। गांव की हवाओं में दर्ज़ कराई प्रयोगशालाओं की वैज्ञानिक गंध। विज्ञान का काफिला चला गाव की ओर। मोजार्ट की तरह वह आनंद के संगीत की नई सिंफनी रच रहे थे। उनकी धमनियों में विकास का संगीत दौड़-धूप कर रहा था। विरासत से आगे भविष्य की ओर...अपनी लय को बिखेरने के लिए। 31 अक्टूबर 1984 से 02 दिसंबर 1988 तक असाधारण कार्यक्षमतावाले,सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी इस स्वप्न-दृष्टा ने बतौर एक कामयाब प्रधानमंत्री पूरे देश को गतिवान बना दिया। इस संक्षिप्त से कार्यकाल में 1965 में मनाया युवावर्ष,1096 में लागू किया पर्यावरण सुरक्षा एक्ट,और 1987 में की महिलाविकास निगम की स्थापना। पूरी ईमानदारी से निभाया अपना दायित्व। मगर कुंठित राजनीति के दुष्प्रचार से एक बार फिर स्पष्ट जनादेश हासिल करने का जज्बा सीने में मचल उठा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोकप्रियता के समुद्र का मंथन करने निकल पड़े राजीव गांधी। इसी क्रम में 21 मई 1991 को 10.30 पर पेरंबदूर जा पहुंचे राजीव गांधी। और देश की अखंडता के लिए खुद खंड-खंड हो गए। शहादत का जो रास्ता महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी ने चुना था उसी रास्ते पर चलकर राजीव गांधी ने शहीद होने का वो सर्वोच्च अलंकरण हासिल कर लिया,जिसे पाने की ख्वाइश एक सच्चे देशभक्त को हमेशा होती है। 6 जुलाई 1991 को कृतज्ञ राष्ट्र ने दिया भारत रत्न का सर्वोच्च सम्मान। जिसे एक जिम्मेदारी की तरह स्वीकार किया उनकी पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी ने। राजीव गांधी के अधूरे सपने पूरे करने के संकल्प के साथ। राजीव गांधी से दो-तीन बार की मधुर स्मृतियों में डूबा मैं जब-जब उन्हें याद करता हूं तो लगता है जैसे-
चमका था जो वो नसीबी सितारा चला गया
गुलशन से बहारों का नज़ारा चला गया
हम देखते ही रह गए आंखें पसारकर
कश्ती से बहुत दूर किनारा चला गया।

पर उनकी यादों की खुशबू आज भी हवाओं में है। और सदियों तक रहेगी।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाड-201003
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