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Monday, September 10, 2012

मैं अपने कछुएपन में ही आनंदित हूं।

भाई भगवान सिंह हंसजी 
और 
प्रकाश प्रलयजी...
मैं आप दोनों का बेहद आभारी हूं। अमुमन यह देखा गया है कि एक रचनाकार को उसकी अग्रज पीढ़ी के साहित्यकार जिंदगीभर अपने से छोटा ही मानते हैं। हमउम्र साहित्यकार कभी उसे अपने बराबर का नहीं मानते और अनुज पीढ़ी के लोग धीरे से उसे आउट डेटेड कहने लगते हैं। मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे एक साथ तीनों पीढ़ियों का अनुराग मिला है और अभी भी मिल रहा है। जिसके उदाहऱण आप भी हैं। इसका सिर्फ एक ही कारण है कि मैंने उखाड़-पछाड़ को नकारकर अपना अधिकतम समय स्वाध्याय में लगाया है। हिंदी साहित्य को अपनी खानदानी जागीर माननेवाले, अपने राजनैतिक आकाओं के पाठ्यक्रम के अनुसार मंच पर उछलकूद करनेवाले और चुटकुलों के बल पर हिंदी कविता के डॉन बननेवाले तमाम चेहरों को मूल्यांकन के डस्टबिन में कीड़े-मकोड़ों की तरह किलबिलाते हुए मैंने देखा है। मैंने बस इतना ही किया कि जब हमारे मित्र पशुमेले के संयोजकों को पटाने में लगे थे मैं निरुक्त,निघंटु,वेद और उपनिषदों को खंगाल रहा था। अभी भी एक कछुए की तरह मैं अपनी ही खोल में हूं। इसलिए कंट्रोल में हूं। यूं भी कछुए की ताकत और उम्र दोनों ही खरगोश से ज्यादा होती है। स्वयं विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर इस तथागत सत्य की ताकीद की है। मैं अपने कछुएपन में ही आनंदित हूं। बहरहाल आपकी आत्मीय टिप्पणी हेतु हार्दिक आभार।
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