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Sunday, October 21, 2012

द ग्रेट अरविन्द जी महाराज......!!!


------------------- शहंशाह-ए-नौटंकी अरविन्द जी महाराज ---------------------

आज इंडिया अगेन्स्ट करप्शन ने यहाँ बवाल किया, कल वहाँ किया. रोज टीवी चैनलों पर यही दिखाया जा रहा है. वाकई में अरविन्द केजरीवाल ने बहुत सोच समझ कर पार्टी का गठन किया है. उनको मैंने बार बार ये कहते हुए सुना है कि मै कोई ज्योतिष नहीं हूँ कि मुझे पता था कांग्रेस हमारे साथ धोखा ही करेगी. मैंने जो पार्टी बनायी है पूरी तरह से राजनीतिक मजबूरी की देन है. उनके मित्र कहते हैं कि वो एक ऐसा ईमानदार आदमी है जो इनकम टैक्स कमिश्नर के पद से इस्तीफा देकर सड़क पे आकर बैठ गया. उसने देश के लिए आमरण अनशन किया.
आमरण अनशन तो जैसे खेल हो गया है भाई. अन्ना हजारे जैसा आदमी भी जब इसका मूल्य नहीं समझ पाया तो अरविन्द जी क्या समझेंगे? इनको अपनी जान से प्यारा कुछ भी नहीं. ये केवल आश्वासन को अपनी जीत समझ लेते हैं. मैंने पढ़ा था कि गांधीजी ने एक अनशन किया था, जब बंटवारे के दंगे चल रहे थे, उन्होंने किसी आश्वासन को नहीं माना, और अनशन तब तक किया, जब तक वो आश्वस्त नहीं हो गए कि खून का एक भी कतरा आज धर्म के नाम पर नहीं बहा है. लेकिन यहाँ का खेल दूसरा है. जैसे ही तबियत ज़रा सी बिगड़ी, वही कुमार विश्वास जो कल तक कह रहे थे कि या तो लोकपाल आएगा, या अरविन्द कि मृत्यु, उन्होंने ही देश कि जनता को तमाशा देखने वाले और हिजड़े की संज्ञा दे डाली और फिर ये अनाउंसमेंट हुई कि जनता के इस जाल में न फंसने कि वजह से नया जाल बुना जाएगा. इस बार वो जाल था, अन्ना हजारे का राजनीती में कूदना. बिना अन्ना कि इजाज़त के टीम अन्ना ने अन्ना पार्टी बना ली. अन्ना को पता चला तो वो समझ गए कि अब मंशा कहाँ जा रही है, वो चुपचाप अलग हो गए, जैसे गाँधी जी कांग्रेस से अलग हो गए थे.
आज अरविन्द बाबू का खेल सारी दुनिया देख रही है. ये वो शख्स हैं. जो सरकार में अफसर के रूप में कार्यरत थे, यानी, मकान के चौकीदार थे, इन्होने पहले नौकरी छोड़ी, फिर इन्होने कहा कि मकान मालिक दारु पीता है इसलिए मकान में रहने के काबिल नही है. और उसके बाद से ये उस मकान के गेट पर बम फोड़ते हैं, गालियाँ देते हैं, डंडे बरसाते हैं और चिल्लाते हैं. 
ये चाहते तो एक विभाग को पूरी तरह करप्शन से मुक्त कर सकते थे. इनका तर्क है कि मै पूरे देश को सुधारना चाहता हूँ. जो आदमी एक विभाग कि झाड नहीं हिला पाया, वो पूरे जंगल को कैसे साफ़ करेगा?

जो अरविन्द जी कर रहे हैं, वो सब करने कि ताकत और हैसियत छोटी से छोटी पार्टी में भी है, कांग्रेस और बीजेपी की तो मै बात ही नहीं करूँगा. कल अगर ये गलती से एक दो सीट पर आ भी गए, और कहीं सड़क बनाके लगे, और कहीं पीछे से कांग्रेस और बीजेपी ने आरोप लगा दिया कि इस सड़क को बनाने में घोटाला हुआ है...उसके बाद इनको कोई काम नहीं करने दिया गया, इनके कार्यालय के बाहर इसी तरह रोज प्रदर्शन हुए, इनके विभागों के बिल फाड़ कर फेंक दिए गए, इनके द्वारे थानों में बंद लोगों को ज़बरदस्ती छुड़ा लिया गया तो क्या होगा लोकतंत्र का? 
क्या अरविन्द केजरीवाल को अब न्यायिक व्यवस्था में भी विश्वास नहीं हैं? क्योंकि संसद में नहीं है ये तो वो बोल चुके हैं. संसद में विश्वास ना होने कि वजह से उन्होंने और उनके गुर्गों ने जो हालत देश कि अस्मिता कि कर दी है, क्या अब न्याय व्यवस्था कि बारी है?

आप लोग सोचिये, मै चाय पी के आता हूँ....!!!!

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