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Saturday, October 20, 2012

धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......

कविता-
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है....
-विशाल चर्चित
इतने सारे घोटाले महंगाई बढ़ती जाती है
रोटी एक गरीब से देखो अब छिनती सी जाती है,
ऐसे में जो जश्न मनाते उनपे तो धिक्कार है

उन्हें बददुआ क्यों ना दें कि जिनकी ये सरकार है;
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......

पूरे दिन पसीना निकले तब जाकर चूल्हा जलता है

एक किसान बड़ी मुश्किल से, अपने बच्चों का तन ढकता है,
एसी में टीवी पर उसका, सूना रहे समाचार हैं
उसके सिर पर इनका चलता अक्सर कारोबार है;
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......

एक जवान रोज़ मरता है नरक में भी ड्यूटी करता है

घर - परिवार शब्द पर अक्सर फूट - फूट रोया करता है,
उसकी झूठी पीठ ठोकते करते जय - जयकार हैं
उसकी विधवा का पेंशन खा जाते ये मक्कार हैं;
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......

खाली ढोंग दिखावे और बड़ी - बड़ी बातें करते हैं

हिन्दी के ठेकेदारों के सब बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते हैं,
कदम - कदम पर आम आदमी को छलता संसार है
जबकि इसके दम पर ही सारी सत्ता - सरकार है;
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......

"चर्चित" का तो ये उसूल है जितना कहना उतना करना

ना तो किसी से धोखा खाना और ना ही तुम धोखा करना,
वर्ना हर पल का हिसाब ऊपर होता तैयार है
यहाँ करोगे चालाकी तो ऊपर खानी मार है;
धिक्कार है - धिक्कार है - धिक्कार है......।
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