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Thursday, November 29, 2012

अशोक वर्मा की नई ग़ज़ल

ग़ज़ल-
टूटते ढहते से खंडहर जब सदा देने लगे
लग रहा जैसे कि सब परदे हवा देने लगे
यादे-रफ़्ता के चराग़ों की कहानी क्या कहूं

बेमजा़ थे सबके सब फिर भी मजा़ देने लगे
एक बुत मैने तराशा हो गई सबको ख़बर
शहर के पत्थर सभी अपना पता देने लगे 
 टुकड़े टुकड़े रेशा रेशा बंट गया जबसे वजूद
नाम तो कुछ और था मुझको वो क्या देने लगे 
 बादलों आकर गिराना आंख से आंसू तभी
सुर्ख़ सूरज जब परिंदों को सजा़ देने लगे।
-अशोक वर्मा
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