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Tuesday, February 5, 2013

ब्रज होने के मायने



ललित-निबंध-
ब्रज होने के मायने

पंडित सुरेश नीरव
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पंडित सुरेश नीरव विख्यात कवि होने के साथ-साथ एक ऐसे बहुविध साहित्य साधक हैं जिन्हें पौराणिक संदर्भों की समकालीन संदर्भों में समय सापेक्ष पड़ताल करने का हुनर भी हासिल है। इस लेख में उन्होंने विश्लेषनात्मक ढंग से ब्रज होने के मायने रेखांकित किए हैं।
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ब्रज समुद्र,मथुरा कमल वृंदावन मकरंद
ब्रज वनिता सब पुष्प हैं मधुकर गोकुलचंद
 सचमुच ब्रज किसी भूखंड का भौगोलिक संबोधन नहीं है। ब्रज तो कला-धर्म-संस्कृति की महाभाव स्थिति है। एक आभ्यांतरिक महायात्रा है। आत्मिक संगीत और चेतना का लयबद्ध नृत्य है- ब्रज। परमात्मा को पुकारने का अहोभाव है- ब्रज। जीवन को जीने का अनवरत मंगल महोत्सव है- ब्रज। हमारी स्तवन आस्थाओं का सुरक्षास्थल है- ब्रज। ब्रज कृष्ण के परमपद, महावीर के कैवल्य और बुद्ध के निर्वाण के त्रयी की प्रयाग स्थली है। ब्रज संस्कार है हमारे विचार और व्यवहार का। ब्रज ऋचा-दृष्टि है..जीवन को देखने की। यह व्रज की ही तो महिमा है जहां की नागरिकता पाते ही यमुना स्वयं विरजा हो जाती है। यह ब्रज जब ब्रज् हो जाता है तो हमारी गति और प्रगति की धुरी बन जाता है। नावनीतर्व्रजद धुर्येः। और यही ब्रज जब ब्रजः हो जाता है तो यह हमारे ऋषि-प्राण का विश्राम स्थल हो जाता है। यह ब्रज ही तो है जहां हमारी कामनाओं का काम्यवन और विराग का महावन दोनों ही अस्तित्व को उपलब्ध होकर वृंदावन हो जाते हैं। यही ब्रज जब ब्रज्या हो जाता है तो हम प्रणियों की जीवन लीला की रंगभूमि बन जाता है। जो हमारे लिए रंग शाला है तो पशुओं का महाचारागाह भी है यही ब्रज। बसावट के व्याकरण में पुर से यानी गांव से भी छोटी और सूक्ष्म इकाई का नाम ब्रज है। यही तो वह ब्रज है जहां आकर सूरदास के प्रज्ञाचक्षु कृष्ण का वात्सल्य देखने लगते हैं। यही वह ब्रज है जहां के निधिवन (संवत 1560) में शब्द को लय से दुलारते-दुलारते वाग्देवी के दास स्वामी हरिदास हो जाते हैं। और राधा-कृष्ण के ललिल-लास्य के रस में डूबकर खान रसखान हो जाते हैं। सृजन के राधा-क्षणों में यहीं बिहारी का काव्य श्रंगार का तुलसीदल बन जाता है। यहां के मंदिर मोक्ष और जीवन के रहस्य को जानने की कालजयी प्रयोगशालाएं हैं। ब्रज में मंदिर हैं यह तो सही है ही मगर मैं कहता हूं कि हर मंदिर में ब्रज है। ब्रज और मंदिर का सम्यक संगीत है ब्रज-संस्कृति। इसी ब्रज के वृंदावन को वृहद्गौतमीय तंत्र में स्वयं कृष्ण ने अपना देह-रूप माना है -
इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम्
अत्र मे पभावः पक्षिमृगाः कीटाः नरामराः
पंचयोजनमेवास्ति वनं मे देहरूपकम्
देह तो वृंदावन को कृष्ण की होना ही था। क्यों कि -ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वृंदा वृजभानुनंदिनी राधा के सोलह नामों में से ही एक नाम है राधा का- राधा षोडशनाम्नां च वृन्दा नाम श्रुतौ श्रुतम् तस्य क्रीड़ावनं रम्यं तेन वृन्दावनं स्मृतम्।
और व्रज के बारह वनों में सातवां वन है वृंदावन। सातवां वन जहां कृष्ण चेतना के सात सुर और राधा के भाव-नूपुर मिलकर महारास-नृत्य करते हैं। स्कंद पुराण में लिखा है- अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः। यहीं है वह गोवर्धन पर्वत जिसे कृष्ण ने इंद्र के अभिमान-मर्दन का उपकरण बनाया। यह ब्रज का ही प्रभाव है जहां कृष्ण के मन से अपने आप प्रेम की गंगा निकलकर मानसी गंगा हो जाती है। महाकवि कालीदास को रघुवंश महाकाव्य में वृन्दावने चैत्ररथादनूनेइस वृंदावन का अनुपम सौन्दर्य कुबेर के प्रसिद्ध चैत्ररथ उद्यान-सा लगता है। यक्षिणी वेंदा को यहां का सौंदर्य इतना भाया कि उसने इसे अपनी निवास-स्थली बनाया। जन्म-जन्म से अशांत इस यक्षिणी को अंततः बुद्ध ने आकर अपने वश में किया था। यक्षिणी की तो बात क्या ब्रज की महा रासलीला का आनंद लेने तो स्वयं शिव को भी गोपी का रुप धरना पड़ा और गोपीश्वर महादेव कहलाए।  महर्षि याज्ञवल्क्य ने यक्ष और पांडवों के बीच हुए जटिल-संवाद जिसके कारण यक्ष-प्रश्न एक मुहावरा बना उसकी प्रश्नभूमि काम्यवन को ही बताया है जिसका कि प्रचलित नाम आज कामां हो गया है। पुराणों के अनुसार पुरवा और उर्वशी के पुत्र अय़ु ने मथुरा की स्थापना की थी। रामायण काल में यही दैत्य लवणासुर की राजधानी थी जिसका कि इक्ष्वाकु वंश के राजा शत्रुघ्न ने वध करके इसे प्राप्त किया था। मान्यता है कि 1,600 ईसा पूर्व यादव राजा मधु के नाम पर उसकी राजधानी का नाम मथुरा पड़ा। मेंगस्थनीज (3वी शताब्दी ईसापूर्व) का यही मेथोरा या क्लीसिबोरा है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के ‘अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः’सगुणोपासक भक्त-कवियों की सृजन स्थली ब्रज, हरिवंश गोस्वामी ,सनातन गोस्वामी, श्रीरुप गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी सहित षड् गोस्वामियों की भक्त-भूमि ब्रज। श्रीहरिराम व्यास नाभाजी, और मीराबाई के इष्टदेव की लीलाभूमि-ब्रज। चैतन्य महाप्रभु,रामकृष्णपरमहंस,विवेकानंद से लेकर अहिल्याबाई होल्कर और माधवराव सिंधिया की पूजाभूमि रहा ब्रज स्वतंत्रता आंदोलन का भी नाभिकेन्द्र रहा है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शीर्ष सेनानी नानाराव धुंधूपंत के इसी ब्रजभूमि में बने बाग-बगीचे और महल क्रांतिकारियों के मिलन केन्द्र बने तो इसी ब्रजभूमि के राजा देवीसिंह की क्रांति परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने पहली आजाद हिंद सरकार बनाकर फिरंगी हुकूमत के सीने पर मूंग दली थी। ब्रज की यही भूमि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रांतकारी जीवन की प्रेरणा स्थली बनी। क्रांतिकारी बनने से पहले कई दिनों तक साधु के वेष में नेताजी यहां रहे। सरफरोशी की तमन्ना रखनेवाले पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने भी फरारी के दिनों में यहीं रहकर ही हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसीएशन के संगठनसूत्रों को बुना था। रंगबिरंगी सांझी से सजी ब्रजभूमि की हवाएं रसिया गाती हैं। गर्ग संहिता (खंड-2) के मुताबिक " उत्तर-पूर्व में बहिर्सद (बरहद),दक्षिण में यदुपुर( शुरसेन का बटेश्वर) और पश्चिम में सोनितपुर के बीच चौरासी कोस के भूमंडल को जिसमें कि विद्वान लोग बसते हैं,ब्रज मंडल कहा गया है।" एफ.एस.ग्राउस ने अपने संस्मरण में ब्रजमंडल के लिए प्रचलित एक कविता का उल्लेख किया है जिसके अनुसार एक तरफ बरा, दूसरी तरफ सोना और तीसरी तरफ शूरसेन से घिरे 84 कोस के भूखंड को ब्रज चौरासी या ब्रजमंडल कहा गया है। आज के परिवेश में यदि ब्रजमंडल की सीमाएं खंगालें तो बरा अलीगढ़ जिला,उत्तरप्रदेश में,सोनहद गुड़गाव,हरियाणा में तथा शुरसेन यानी आज का बटेश्वर,बाहा,उत्तरप्रदेश तक फैला क्षेत्र ब्रजमंडल हुआ।
ब्रजमंडल के वन-  अप्राप्य को प्राप्त करने की चेष्टा का संबोधन है-वन्। स्वामित्व को उपलब्ध हो जाना भी है-वन्। पूजने का भाव भी है- वन्। जो स्तवन होकर हमारी अक्षय आस्थाओं में गूंजता है। इस वन से ही वनस्पति है। और इस वन से ही वनिता है। यह वन का ही अनुराग है जो कृष्ण को वनमाली बना देता है। जो द्वारिकाधीश होने पर भी अपनी द्वारिका का नाम वनमालिनी रखते हैं। वनपुत्रों के लिए वन ही वनदेवी है। और जब रामनिष्ठ आस्था वानर में उतरती है तो वन का यही वानर हनुमान हो जाता है। वन की हवा ही पावन पवन है और वन की बरखा ही सावन है। वन का मंद-मद बहता मलयज समीर ही प्रकृति का हवन है।  हमारा वानप्रस्थ भी इस वन के ही सापेक्ष है। यह वन तपोवन भी हैं और काम्यवन भी।  पद्म-पुराण, वराह-पुराण, भविष्य-पुराण और विष्णु-पुराण में चौरासी कोस में फैले इस ब्रजमंडल के वन,प्रतिवन,उपवन और अधिवनों की व्यापक चर्चा की गई है। पद्मपुराण के अनुसार यमुना के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बारह वन स्थित हैं। (1) महावन (2) काम्यवन(3)मधुवन (4)तालवन (5) कुमुदवन (6)भांडिरवन (7) वृंदावन (8) खादिरवन (9) लोहवन (10) भद्रवन (11)बहुलवन (12) बेलवन। इनमें मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलवन, कामवन,खादिरवन और वृंदावन ये सात वन यमुना के पश्चिमी तट पर तथा भाद्रवन,बेलवन,लोहवन और महावन यमुना के पूर्वी तट पर स्थित बताए गए हैं। वराह पुराण में बारह उपवनों का भी उल्लेख मिलता है। वराह पुराण के अनुसार ये उपवन हैं- (1) ब्रह्मा वन,(2) अप्सरा वन,(3)विह्वल वन,(4) कदंब वन,(5) स्वर्ण वन,(6) सुरभि वन,(7) प्रेम वन,(8) मयूर वन,(9) मनेंगित वन,(10) शेशाज्ञ वन,(11) नारद वन और (12) परमानंद वन। भविष्यपुराण में इन वनों के वर्गीकरण करते हुए बारह प्रतिवन भी बताए गए हैं। जो इस प्रकार हैं- (1) रांका वन,(2) वर्त्त वन,(3) करहा वन,(4)काम वन,(5) अंजना वन,(6) कर्ण वन,(7)कृष्णाक्षिपण वन,(8) नंदप्रेक्षणा वन,(9) इंद्रा वन,(10) शिक्षा वन, (11) चंद्रावलि वन और (12) लोह वन। विष्णुपुराण में आगे बारह अधिवन भी बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-(1) मथुरा (2) राधाकुंड (3) नंदगांव (4) गढ़ा (5) ललिता ग्राम (6) वृषभानुपुर (7) गोकुल (8) बलभद्रवन (9) गोवर्धन (10) जावत (11) वृंदावन और (12) संकेतवन।

. ब्रजमंडल के मंदिर


बरसाना के मंदिर-  बरसाना यानी अतीत का वृषभानुपुर। ब्रजमंडल का ऋषिप्राण है,यह बरसाना। बरसाना के बिना ब्रज का अस्तित्व ही अधूरा है। राधा की जन्मभूमि है बरसाना। जिसके कृपा कटाक्ष के लिए स्वयं कृष्ण सदैव लालायित रहते थे। यहां आकर कृष्ण कृष्ण नहीं बल्कि राधावल्भ हो जाते हैं। एक ही अद्वैत का द्वैत हैं राधा और कृष्ण। जो दो देह में प्रकट होते हैं। विष्णु कृष्ण बनकर यहां लीलाएं करेंगे। ब्रह्मा को यह ज्ञात था। वो इन लीलाओं के साक्षी बनना चाहते थे। पद्मपुराण में विष्णु ने उन्हें बरसाने में यानी वृषभानुपुर में पर्वतरूप धारण करने को कहा। पद्मपुराण के अनुसार विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत आमने सामने वृषभानुपुर में विद्यमान हैं। दाहिनी ओर ब्रह्म पर्वत और बायीं विष्णु पर्वत। कृष्म और राधा की लीलाएं बरसाने के कण-कण में व्याप्त हैं। राधारानी का मंदिर,जयपुरमंदिर और रंगोली महल मैं जैसे इतिहास आज भी अपना पुनर्पाठ करता है।
नंद गांव- नंदजी का मंदिर
बलदेव- दाउजी का मंदिर, क्षीर सागर
महावन- मथुरानाथ श्री द्वारिका नाथ, ब्रह्मांड घाट,रसखान की समाधि,चौरासी खंभा,ऊखल बंधन आश्रम,चिंताहरण आश्रम,रमण रेती आश्रम।
गोकुल-नवनीत प्रिया का मंदिर,कृष्णद्वार गोकुल,गोकुल घाट।
काम्यवन (कामां)- चंद्रमाजी का मंदिर,विमलकुंड,गया कुंड,केदारनाथ मंदिर, चरण पहाड़ी, व्योमासुर गुफा, भोजन थाली, राम-हनुमान मंदिर, श्रीकुंड,मदनमोहन का मंदिर।
गोवर्द्धन - गोवर्द्धन पर्वत राधाकुण्ड से तीन मील की दूरी पर है। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहीं भगवान कृष्म के प्रपौत्र वज्रनाभ ने हरिदेवजी की कभी प्रतिष्ठा की थी। औरंगजेबी काल में यहाँ से वो प्रतिमा लापता हो गई। बाद में उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यहीं वज्रनाभ द्वारा बनवाया गया चक्रेश्वर महादेव का मंदिर भी है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्द्धन गांव बसा है तथा एक मनसादेवी का मंदिर है। भगवान्‌ के मन से उत्पन्न मानसीगंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है। गोवर्धन में गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं,जो भक्तों की आस्था के केन्द्र हैं।
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शब्द और लय के अप्रतिम साधकः स्वामी हरिदास
पंडित सुरेश नीरव
कला की सत्ता संसार की सर्वोच्च सत्ता है। जिसके आगे बड़े-बड़े सम्राट अपना सिर झुकाते हैं। और फिर जिसका सृजन स्वातःसुखाय हो उसे इस बात की परवाह भी कब रहती है। स्वामी हरिदासजी शब्द और लय के एक ऐसे ही अनन्य साधक थे। जो श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ उच्च कोटि के संगीतज्ञ भी थे। स्वामी हरिदासजी का जन्म विक्रम संवत 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्रीराधाष्टमी) के दिन ब्रह्म मुहूर्त में माना जाता है इनके जन्म स्थान और गुरु के विषय में कई मत प्रचलित हैं। वे बचपन से ही एकांत-प्रिय थे। वे दुन-रात राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते थे। हरिदासजी में संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। विक्रम संवत 1560 में 25 वर्ष की अवस्था में श्रीहरिदास जी वृंदावन पहुंचे और उन्होंने निधिवन को अपनी तपस्थली बनाया। हरिदास कृष्णोपासक सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे, जिसे हरिदासी संप्रदाय भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक हरिदास स्वामी वैष्णव भक्त थे तथा किस कोटि के संगीतज्ञ होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके शिष्य बेजू बाबरा और तानसेन थे। और इनके वैष्णव संगीत का रसास्वादन करने स्वयं सम्राट अकबर वृंदावन गए थे। 'केलिमाल में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। स्वामी हरिदास का रचनाकाल सन् 1543 से 1560 ई. के बीच का माना गया है। स्वामी हरिदासजी को कृष्णोपासक सखी संप्रदाय का प्रवर्तक मान गया है, जिसे 'हरिदासी संप्रदाय' भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक है। 'केलिमाल' में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। स्वामी हरिदास अद्भुत और अलौकिक प्रेमी भक्त थे। और ब्रज की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर भी। इनकी स्मृति को समर्पित ब्रजमंडल में अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं और प्रतिवर्ष स्वामीहरिदास जयंती पर वृंदावन में अनेक संगीत और काव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं।

स्वामी हरिदासजीजी के पद-

पद

तिनका बयारि के बस।
ज्यौं भावै त्यौं उडाइ लै जाइ आपने रस॥
ब्रह्मलोक सिवलोक और लोक अस।
कह 'हरिदास बिचारि देख्यो, बिना बिहारी नहीं जस॥
जौं लौं जीवै तौं लौं हरि भजु, और बात सब बादि।
दिवस चारि को हला भला, तू कहा लेइगो लादि॥
मायामद, गुनमद, जोबनमद, भूल्यो नगर बिबादि।
कहि 'हरिदास लोभ चरपट भयो, काहे की लागै फिरादि॥
गहौ मन सब रस को रस सार।
लोक वेद कुल करमै तजिये, भजिये नित्य बिहार॥
गृह, कामिनि, कंचन धन त्यागौ, सुमिरौ स्याम उदार।
कहि 'हरिदास रीति संतन की, गादी को अधिकार॥













ललित-निबंध-
ब्रज होने के मायने

पंडित सुरेश नीरव
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पंडित सुरेश नीरव विख्यात कवि होने के साथ-साथ एक ऐसे बहुविध साहित्य साधक हैं जिन्हें पौराणिक संदर्भों की समकालीन संदर्भों में समय सापेक्ष पड़ताल करने का हुनर भी हासिल है। इस लेख में उन्होंने विश्लेषनात्मक ढंग से ब्रज होने के मायने रेखांकित किए हैं।
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ब्रज समुद्र,मथुरा कमल वृंदावन मकरंद
ब्रज वनिता सब पुष्प हैं मधुकर गोकुलचंद
 सचमुच ब्रज किसी भूखंड का भौगोलिक संबोधन नहीं है। ब्रज तो कला-धर्म-संस्कृति की महाभाव स्थिति है। एक आभ्यांतरिक महायात्रा है। आत्मिक संगीत और चेतना का लयबद्ध नृत्य है- ब्रज। परमात्मा को पुकारने का अहोभाव है- ब्रज। जीवन को जीने का अनवरत मंगल महोत्सव है- ब्रज। हमारी स्तवन आस्थाओं का सुरक्षास्थल है- ब्रज। ब्रज कृष्ण के परमपद, महावीर के कैवल्य और बुद्ध के निर्वाण के त्रयी की प्रयाग स्थली है। ब्रज संस्कार है हमारे विचार और व्यवहार का। ब्रज ऋचा-दृष्टि है..जीवन को देखने की। यह व्रज की ही तो महिमा है जहां की नागरिकता पाते ही यमुना स्वयं विरजा हो जाती है। यह ब्रज जब ब्रज् हो जाता है तो हमारी गति और प्रगति की धुरी बन जाता है। नावनीतर्व्रजद धुर्येः। और यही ब्रज जब ब्रजः हो जाता है तो यह हमारे ऋषि-प्राण का विश्राम स्थल हो जाता है। यह ब्रज ही तो है जहां हमारी कामनाओं का काम्यवन और विराग का महावन दोनों ही अस्तित्व को उपलब्ध होकर वृंदावन हो जाते हैं। यही ब्रज जब ब्रज्या हो जाता है तो हम प्रणियों की जीवन लीला की रंगभूमि बन जाता है। जो हमारे लिए रंग शाला है तो पशुओं का महाचारागाह भी है यही ब्रज। बसावट के व्याकरण में पुर से यानी गांव से भी छोटी और सूक्ष्म इकाई का नाम ब्रज है। यही तो वह ब्रज है जहां आकर सूरदास के प्रज्ञाचक्षु कृष्ण का वात्सल्य देखने लगते हैं। यही वह ब्रज है जहां के निधिवन (संवत 1560) में शब्द को लय से दुलारते-दुलारते वाग्देवी के दास स्वामी हरिदास हो जाते हैं। और राधा-कृष्ण के ललिल-लास्य के रस में डूबकर खान रसखान हो जाते हैं। सृजन के राधा-क्षणों में यहीं बिहारी का काव्य श्रंगार का तुलसीदल बन जाता है। यहां के मंदिर मोक्ष और जीवन के रहस्य को जानने की कालजयी प्रयोगशालाएं हैं। ब्रज में मंदिर हैं यह तो सही है ही मगर मैं कहता हूं कि हर मंदिर में ब्रज है। ब्रज और मंदिर का सम्यक संगीत है ब्रज-संस्कृति। इसी ब्रज के वृंदावन को वृहद्गौतमीय तंत्र में स्वयं कृष्ण ने अपना देह-रूप माना है -
इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम्
अत्र मे पभावः पक्षिमृगाः कीटाः नरामराः
पंचयोजनमेवास्ति वनं मे देहरूपकम्
देह तो वृंदावन को कृष्ण की होना ही था। क्यों कि -ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वृंदा वृजभानुनंदिनी राधा के सोलह नामों में से ही एक नाम है राधा का- राधा षोडशनाम्नां च वृन्दा नाम श्रुतौ श्रुतम् तस्य क्रीड़ावनं रम्यं तेन वृन्दावनं स्मृतम्।
और व्रज के बारह वनों में सातवां वन है वृंदावन। सातवां वन जहां कृष्ण चेतना के सात सुर और राधा के भाव-नूपुर मिलकर महारास-नृत्य करते हैं। स्कंद पुराण में लिखा है- अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः। यहीं है वह गोवर्धन पर्वत जिसे कृष्ण ने इंद्र के अभिमान-मर्दन का उपकरण बनाया। यह ब्रज का ही प्रभाव है जहां कृष्ण के मन से अपने आप प्रेम की गंगा निकलकर मानसी गंगा हो जाती है। महाकवि कालीदास को रघुवंश महाकाव्य में वृन्दावने चैत्ररथादनूनेइस वृंदावन का अनुपम सौन्दर्य कुबेर के प्रसिद्ध चैत्ररथ उद्यान-सा लगता है। यक्षिणी वेंदा को यहां का सौंदर्य इतना भाया कि उसने इसे अपनी निवास-स्थली बनाया। जन्म-जन्म से अशांत इस यक्षिणी को अंततः बुद्ध ने आकर अपने वश में किया था। यक्षिणी की तो बात क्या ब्रज की महा रासलीला का आनंद लेने तो स्वयं शिव को भी गोपी का रुप धरना पड़ा और गोपीश्वर महादेव कहलाए।  महर्षि याज्ञवल्क्य ने यक्ष और पांडवों के बीच हुए जटिल-संवाद जिसके कारण यक्ष-प्रश्न एक मुहावरा बना उसकी प्रश्नभूमि काम्यवन को ही बताया है जिसका कि प्रचलित नाम आज कामां हो गया है। पुराणों के अनुसार पुरवा और उर्वशी के पुत्र अय़ु ने मथुरा की स्थापना की थी। रामायण काल में यही दैत्य लवणासुर की राजधानी थी जिसका कि इक्ष्वाकु वंश के राजा शत्रुघ्न ने वध करके इसे प्राप्त किया था। मान्यता है कि 1,600 ईसा पूर्व यादव राजा मधु के नाम पर उसकी राजधानी का नाम मथुरा पड़ा। मेंगस्थनीज (3वी शताब्दी ईसापूर्व) का यही मेथोरा या क्लीसिबोरा है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के ‘अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः’सगुणोपासक भक्त-कवियों की सृजन स्थली ब्रज, हरिवंश गोस्वामी ,सनातन गोस्वामी, श्रीरुप गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी सहित षड् गोस्वामियों की भक्त-भूमि ब्रज। श्रीहरिराम व्यास नाभाजी, और मीराबाई के इष्टदेव की लीलाभूमि-ब्रज। चैतन्य महाप्रभु,रामकृष्णपरमहंस,विवेकानंद से लेकर अहिल्याबाई होल्कर और माधवराव सिंधिया की पूजाभूमि रहा ब्रज स्वतंत्रता आंदोलन का भी नाभिकेन्द्र रहा है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शीर्ष सेनानी नानाराव धुंधूपंत के इसी ब्रजभूमि में बने बाग-बगीचे और महल क्रांतिकारियों के मिलन केन्द्र बने तो इसी ब्रजभूमि के राजा देवीसिंह की क्रांति परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने पहली आजाद हिंद सरकार बनाकर फिरंगी हुकूमत के सीने पर मूंग दली थी। ब्रज की यही भूमि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रांतकारी जीवन की प्रेरणा स्थली बनी। क्रांतिकारी बनने से पहले कई दिनों तक साधु के वेष में नेताजी यहां रहे। सरफरोशी की तमन्ना रखनेवाले पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने भी फरारी के दिनों में यहीं रहकर ही हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसीएशन के संगठनसूत्रों को बुना था। रंगबिरंगी सांझी से सजी ब्रजभूमि की हवाएं रसिया गाती हैं। गर्ग संहिता (खंड-2) के मुताबिक " उत्तर-पूर्व में बहिर्सद (बरहद),दक्षिण में यदुपुर( शुरसेन का बटेश्वर) और पश्चिम में सोनितपुर के बीच चौरासी कोस के भूमंडल को जिसमें कि विद्वान लोग बसते हैं,ब्रज मंडल कहा गया है।" एफ.एस.ग्राउस ने अपने संस्मरण में ब्रजमंडल के लिए प्रचलित एक कविता का उल्लेख किया है जिसके अनुसार एक तरफ बरा, दूसरी तरफ सोना और तीसरी तरफ शूरसेन से घिरे 84 कोस के भूखंड को ब्रज चौरासी या ब्रजमंडल कहा गया है। आज के परिवेश में यदि ब्रजमंडल की सीमाएं खंगालें तो बरा अलीगढ़ जिला,उत्तरप्रदेश में,सोनहद गुड़गाव,हरियाणा में तथा शुरसेन यानी आज का बटेश्वर,बाहा,उत्तरप्रदेश तक फैला क्षेत्र ब्रजमंडल हुआ।
ब्रजमंडल के वन-  अप्राप्य को प्राप्त करने की चेष्टा का संबोधन है-वन्। स्वामित्व को उपलब्ध हो जाना भी है-वन्। पूजने का भाव भी है- वन्। जो स्तवन होकर हमारी अक्षय आस्थाओं में गूंजता है। इस वन से ही वनस्पति है। और इस वन से ही वनिता है। यह वन का ही अनुराग है जो कृष्ण को वनमाली बना देता है। जो द्वारिकाधीश होने पर भी अपनी द्वारिका का नाम वनमालिनी रखते हैं। वनपुत्रों के लिए वन ही वनदेवी है। और जब रामनिष्ठ आस्था वानर में उतरती है तो वन का यही वानर हनुमान हो जाता है। वन की हवा ही पावन पवन है और वन की बरखा ही सावन है। वन का मंद-मद बहता मलयज समीर ही प्रकृति का हवन है।  हमारा वानप्रस्थ भी इस वन के ही सापेक्ष है। यह वन तपोवन भी हैं और काम्यवन भी।  पद्म-पुराण, वराह-पुराण, भविष्य-पुराण और विष्णु-पुराण में चौरासी कोस में फैले इस ब्रजमंडल के वन,प्रतिवन,उपवन और अधिवनों की व्यापक चर्चा की गई है। पद्मपुराण के अनुसार यमुना के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बारह वन स्थित हैं। (1) महावन (2) काम्यवन(3)मधुवन (4)तालवन (5) कुमुदवन (6)भांडिरवन (7) वृंदावन (8) खादिरवन (9) लोहवन (10) भद्रवन (11)बहुलवन (12) बेलवन। इनमें मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलवन, कामवन,खादिरवन और वृंदावन ये सात वन यमुना के पश्चिमी तट पर तथा भाद्रवन,बेलवन,लोहवन और महावन यमुना के पूर्वी तट पर स्थित बताए गए हैं। वराह पुराण में बारह उपवनों का भी उल्लेख मिलता है। वराह पुराण के अनुसार ये उपवन हैं- (1) ब्रह्मा वन,(2) अप्सरा वन,(3)विह्वल वन,(4) कदंब वन,(5) स्वर्ण वन,(6) सुरभि वन,(7) प्रेम वन,(8) मयूर वन,(9) मनेंगित वन,(10) शेशाज्ञ वन,(11) नारद वन और (12) परमानंद वन। भविष्यपुराण में इन वनों के वर्गीकरण करते हुए बारह प्रतिवन भी बताए गए हैं। जो इस प्रकार हैं- (1) रांका वन,(2) वर्त्त वन,(3) करहा वन,(4)काम वन,(5) अंजना वन,(6) कर्ण वन,(7)कृष्णाक्षिपण वन,(8) नंदप्रेक्षणा वन,(9) इंद्रा वन,(10) शिक्षा वन, (11) चंद्रावलि वन और (12) लोह वन। विष्णुपुराण में आगे बारह अधिवन भी बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-(1) मथुरा (2) राधाकुंड (3) नंदगांव (4) गढ़ा (5) ललिता ग्राम (6) वृषभानुपुर (7) गोकुल (8) बलभद्रवन (9) गोवर्धन (10) जावत (11) वृंदावन और (12) संकेतवन।

. ब्रजमंडल के मंदिर


बरसाना के मंदिर-  बरसाना यानी अतीत का वृषभानुपुर। ब्रजमंडल का ऋषिप्राण है,यह बरसाना। बरसाना के बिना ब्रज का अस्तित्व ही अधूरा है। राधा की जन्मभूमि है बरसाना। जिसके कृपा कटाक्ष के लिए स्वयं कृष्ण सदैव लालायित रहते थे। यहां आकर कृष्ण कृष्ण नहीं बल्कि राधावल्भ हो जाते हैं। एक ही अद्वैत का द्वैत हैं राधा और कृष्ण। जो दो देह में प्रकट होते हैं। विष्णु कृष्ण बनकर यहां लीलाएं करेंगे। ब्रह्मा को यह ज्ञात था। वो इन लीलाओं के साक्षी बनना चाहते थे। पद्मपुराण में विष्णु ने उन्हें बरसाने में यानी वृषभानुपुर में पर्वतरूप धारण करने को कहा। पद्मपुराण के अनुसार विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत आमने सामने वृषभानुपुर में विद्यमान हैं। दाहिनी ओर ब्रह्म पर्वत और बायीं विष्णु पर्वत। कृष्म और राधा की लीलाएं बरसाने के कण-कण में व्याप्त हैं। राधारानी का मंदिर,जयपुरमंदिर और रंगोली महल मैं जैसे इतिहास आज भी अपना पुनर्पाठ करता है।
नंद गांव- नंदजी का मंदिर
बलदेव- दाउजी का मंदिर, क्षीर सागर
महावन- मथुरानाथ श्री द्वारिका नाथ, ब्रह्मांड घाट,रसखान की समाधि,चौरासी खंभा,ऊखल बंधन आश्रम,चिंताहरण आश्रम,रमण रेती आश्रम।
गोकुल-नवनीत प्रिया का मंदिर,कृष्णद्वार गोकुल,गोकुल घाट।
काम्यवन (कामां)- चंद्रमाजी का मंदिर,विमलकुंड,गया कुंड,केदारनाथ मंदिर, चरण पहाड़ी, व्योमासुर गुफा, भोजन थाली, राम-हनुमान मंदिर, श्रीकुंड,मदनमोहन का मंदिर।
गोवर्द्धन - गोवर्द्धन पर्वत राधाकुण्ड से तीन मील की दूरी पर है। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहीं भगवान कृष्म के प्रपौत्र वज्रनाभ ने हरिदेवजी की कभी प्रतिष्ठा की थी। औरंगजेबी काल में यहाँ से वो प्रतिमा लापता हो गई। बाद में उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यहीं वज्रनाभ द्वारा बनवाया गया चक्रेश्वर महादेव का मंदिर भी है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्द्धन गांव बसा है तथा एक मनसादेवी का मंदिर है। भगवान्‌ के मन से उत्पन्न मानसीगंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है। गोवर्धन में गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं,जो भक्तों की आस्था के केन्द्र हैं।
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शब्द और लय के अप्रतिम साधकः स्वामी हरिदास
पंडित सुरेश नीरव
कला की सत्ता संसार की सर्वोच्च सत्ता है। जिसके आगे बड़े-बड़े सम्राट अपना सिर झुकाते हैं। और फिर जिसका सृजन स्वातःसुखाय हो उसे इस बात की परवाह भी कब रहती है। स्वामी हरिदासजी शब्द और लय के एक ऐसे ही अनन्य साधक थे। जो श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ उच्च कोटि के संगीतज्ञ भी थे। स्वामी हरिदासजी का जन्म विक्रम संवत 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्रीराधाष्टमी) के दिन ब्रह्म मुहूर्त में माना जाता है इनके जन्म स्थान और गुरु के विषय में कई मत प्रचलित हैं। वे बचपन से ही एकांत-प्रिय थे। वे दुन-रात राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते थे। हरिदासजी में संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। विक्रम संवत 1560 में 25 वर्ष की अवस्था में श्रीहरिदास जी वृंदावन पहुंचे और उन्होंने निधिवन को अपनी तपस्थली बनाया। हरिदास कृष्णोपासक सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे, जिसे हरिदासी संप्रदाय भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक हरिदास स्वामी वैष्णव भक्त थे तथा किस कोटि के संगीतज्ञ होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके शिष्य बेजू बाबरा और तानसेन थे। और इनके वैष्णव संगीत का रसास्वादन करने स्वयं सम्राट अकबर वृंदावन गए थे। 'केलिमाल में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। स्वामी हरिदास का रचनाकाल सन् 1543 से 1560 ई. के बीच का माना गया है। स्वामी हरिदासजी को कृष्णोपासक सखी संप्रदाय का प्रवर्तक मान गया है, जिसे 'हरिदासी संप्रदाय' भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक है। 'केलिमाल' में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। स्वामी हरिदास अद्भुत और अलौकिक प्रेमी भक्त थे। और ब्रज की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर भी। इनकी स्मृति को समर्पित ब्रजमंडल में अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं और प्रतिवर्ष स्वामीहरिदास जयंती पर वृंदावन में अनेक संगीत और काव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं।

स्वामी हरिदासजीजी के पद-

पद

तिनका बयारि के बस।
ज्यौं भावै त्यौं उडाइ लै जाइ आपने रस॥
ब्रह्मलोक सिवलोक और लोक अस।
कह 'हरिदास बिचारि देख्यो, बिना बिहारी नहीं जस॥
जौं लौं जीवै तौं लौं हरि भजु, और बात सब बादि।
दिवस चारि को हला भला, तू कहा लेइगो लादि॥
मायामद, गुनमद, जोबनमद, भूल्यो नगर बिबादि।
कहि 'हरिदास लोभ चरपट भयो, काहे की लागै फिरादि॥
गहौ मन सब रस को रस सार।
लोक वेद कुल करमै तजिये, भजिये नित्य बिहार॥
गृह, कामिनि, कंचन धन त्यागौ, सुमिरौ स्याम उदार।
कहि 'हरिदास रीति संतन की, गादी को अधिकार॥











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